Saturday, 23 February 2019

एक और दिन

अब मैं बदल गया हूँ , वो जिसे सुबह उठने की न जल्दबाज़ी होती थी , बिस्तर से यूँ एक बार दिन को देख लेता और देर तक लेटा रहता था । शायद कोई आएगा और जगायेगा , बस इसी इंतेज़ार में सिर्फ बिस्तर पर लेटे इंतेज़ार लंबा होता गया .... दिन गायब हो जाता ।
कई दिन तक मैंने सिर्फ रातों को देखा ... जब कि रातों के अंधेरे में सिर्फ मुझे कालापन दिखाई देता रहा । रातों को बस पास से गुजरते देखा ।
कभी कभी जी चाहता था इन में भटक जाऊं ।
जो भी घटित हो रहा है उसे बदल दूं अपनी मर्ज़ी से ।
मैं ये वाले मोड़ से मुड़ने की बजाए और आगे चला जाऊं और खो जाऊं । सुनसान गलियों में जहां इतना अंधेरा हो के मैं चाह कर भी न लौट पाऊँ । बस ऐसा कुछ चलता रहे .. भटकते भटकते किसी और जगह निकल जाऊं और नए रास्ते पे आ जाऊं ।
मुझे पता है और मैं सामान्य हूँ
मैं एक अच्छा इंसान हूँ
मगर असामान्य आकर्षित करता है ।
मैं इस विशाल अंधेरे में एक किरण देखता हूँ ।
मैं उसके उल्ट (विपरित दिशा )  भागना शुरू करता हूँ
कहीं मुझे कोई उजाला पकड़ न ले
मैं इतना तेज भागता हूँ ।
सब कुछ बिगड़ता हुआ नजर आने लगता है
मैं क्यों भाग रहा हूँ
कौन अच्छा है
वो जो किरण मेरी तरफ आ रही है
क्यों डर है उसके उगने का
मैं भागते भागते निश्चय कर चुका हूँ
कि मैं अच्छा होने के लिए भाग रहा हूँ
और इतने में देर हो जाती है
मैं पूरी तरह हार जाने से पहले थक जाता हूँ
एक सूरज है रौशनी का जो मेरा सारा अंधेरा निगल चुका है ।
रौशनी से सब सफेद हो चुका है ।
मेरा झूठ सच्च हो गया
या झूठ  सच्च
मेरे सामने एक खिड़की है
और कोई है जी बाहर से झांक रहा है
और जोर जोर से मुस्करा रहा है
मैं किसी बंद कमरे में कैद हूँ ।
वो बाहर आज़ाद खुले आसमान में मुस्करा रहा है
जैसे बोल रहा है - मैंने तुम्हें आज फिर पकड़ लिया आज मैं फिर जीत गया ।
चलो जैसे ही वो अपनी जगह से हिलता है
ये खेल फिर दोबारा चलता है ।
मैं रोज़ जीत और हार के बीच आ जे खड़ा हो जाता हूँ ।
और देखता हूँ
खेल खत्म या चलता रहे ।

पंकज शर्मा

Tuesday, 8 January 2019

ਸੁਫ਼ਨੇ ਦੇ ਝੂਟੇ

ਸਫ਼ਰ ਚ ਰਹਿਣਾ ਮੈਂ +2 ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਈ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰਤਾ ਸੀ , ਓਸ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਸਿਰਫ ਆਵਦੇ ਪਿੰਡ ਦਾ ਪਤਾ ਸੀ ਜਾ ਆਸ ਪਾਸ ਦੇ ਪਿੰਡਾਂ ਤੱਕ ਸਾਈਕਲ ਤੇ  ਜਾਂ ਟਰੈਕਟਰ ਤੇ ਨਿੱਕੇ ਸਫ਼ਰ ਕਰ.  ਚੁੱਕਿਆ ਸੀ ..
ਉਸ ਟਾਈਮ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡਾ ਸਫ਼ਰ ਹੁੰਦਾ ਸੀ ਬੱਸ ਤੇ 18 ਕਿਲੋਮੀਟਰ ਸਾਡੇ ਪਿੰਡ ਤੋਂ ਸ਼ਹਿਰ ਰਾਸ਼ਨ ਪਾਣੀ ਲੈਣ ਲਈ ਸ਼ਹਿਰ ਆਉਣਾ ਜਾਂ ਨਾਨਕੇ ਆਉਣ ਦਾ ਸਫਰ ....
+2 ਤੱਕ ਪੜ੍ਹਾਈ  ਹੋਰ(ਅਜੀਬ ) ਜੀ ਲੱਗਣ ਲੱਗ ਗੀ ਸੀ , ਫੇਰ ਬੀ.ਕੋਮ ਦੀ ਪੜ੍ਹਾਈ ਅੱਧ ਚੋਂ ਛੱਡ ਕੇ ,ਮਨ 'ਚ ਠਾਣ ਲਈ ਸੀ ਬੀ ਆਵਦੇ ਦਮ ਤੇ ਕੁੱਛ ਕਰਨਾ , ਇਹ ਨੀ ਪਤਾ ਸੀ ਕੀ ਕਰਨਾ ? 😜

ਬੱਸ ਬੈਗ ਭਰ ਲੈਣਾ ਲੀੜਿਆਂ ਦਾ ਤੇ ਤੁਰ ਪੈਣਾ ਸ਼ਹਿਰ ਚੋਂ ਬਾਹਰ ਨਿਕਲਦੀਆਂ 3 ਸੜਕਾਂ ਚੋਂ ਕਿਸੇ ਇੱਕ ਤੇ , ਹੱਥ ਪੱਲੇ ਮਾਰਨੇ ਜਦੋਂ ਜਾਪਣਾ ਕੀ ਬਾਈ ਗਲਤ ਸੜਕ ਤੇ ਆਗੇ !!! ਤਾਂ ਉਹ ਸਡ਼ਕ ਛੱਡ ਕੇ ਕੋਈ ਹੋਰ ਸੜਕ ਮੱਲ ਲੈਣੀ ਤੇ ਚਲਦੇ ਜਾਣਾ ਅੰਨ੍ਹੇ ਵਾਹ  , ਕਦੇ ਬੱਸ , ਕਦੇ ਮੋਟਰਸੈਕਲ, ਕਦੇ ਰੇਲ , ਕਦੇ ਨਿਰਾਸ਼ ਹੋ ਕੇ ਘਰ ਪਰਤ ਆਉਣਾ ...
ਜਦੋਂ ਦੂਰ-ਨਾਲ  ਦਿਆਂ ਨੇ ਪੁੱਛਣਾ ਬੀ ਕੀ ਬਣਿਆ ?,
ਜਵਾਬ ਤਾਂ ਲਭਿਆ ਨਾ ਹੋਣਾ , ਮੈਂ ਚੱਕ ਕੇ ਝੋਲਾ ਫੇਰ ਨਿੱਕਲ ਜਾਣਾ ਓਹਨਾ ਦਾ ਜਵਾਬ ਲੱਭਣ ਬੀ ਕੀ ਬਣਿਆਂ ? .......
ਕਿਉਂ ਕੇ ਹਜੇ ਤਾਂ ਮੈਨੂੰ ਇਹ ਹੀ ਨੀ ਸਮਝ ਆ ਰਿਹਾ ਸੀ ਬੀ ਕਰਨਾ ਕੀ ਆ  ?..

ਕੀ ਬਣਿਆ ? ਦਾ ਜਵਾਬ ਲਭਣੈ ਜਾਂ ਕੀ ਕਰਣੈ? ਦਾ ...
ਪਰ ਸਫ਼ਰ ਜਾਰੀ ਰਿਹਾ , ਦੌਰਾਨ ਸਫ਼ਰ ਦੇ ਕਾਫੀ ਨੋਕਰੀਆਂ , ਚਾਕਰੀਆਂ , ਬਿਜ਼ਨਸ , ਦੁਕਾਨਦਾਰੀਆਂ, ਗੇਮਾਂ ਆਈਆਂ ,
ਸਵਾਦ ਕਿਸੇ ਚ ਵੀ ਨੀ ਸੀ , ਇੱਕ ਜਗ੍ਹਾ ਤੇ ਰੋਕ ਕੇ ਮੈਨੂੰ ਰਪੀਟ ਤੇ ਲਾਈ ਰੱਖਦੀਆਂ ਸੀ...
ਹਾਲਾਂ ਕੇ ਆਸੇ ਪਾਸੇ ਸਾਰੇ ਲੋਕ ਆਹੀ ਕਰ ਰਹੇ ਸੀ , ਖਰਚਣ ਨੂੰ ਪੈਸੇ ਵੀ ਮਿਲਦੇ ਸੀ ...
ਪਰ ਓਹੀ ਵਾਰ ਵਾਰ ਕਰਨਾ ਅਕਾ ਦਿੰਦਾ ਸੀ , ਦਿੱਲ ਲਗਣੋ ਹੱਟ ਜਾਂਦਾ ਸੀ , ਸਵਾਦ ਨੀ ਆਓਂਦਾ ਸੀ ਨਜਾਰੇ ਨੀ ਆਓਂਦੇ ਸੀ .....
ਜਾ ਹਜੇ ਜਵਾਬ ਨੀ ਲਭਿਆ ਸੀ ਬੀ "ਕਰਨਾ ਕੀ ਐ ?"

ਫੇਰ ਕੁੱਛ ਚੰਗੇ ਸਲਾਹ  ਸਲਾਹਕਾਰ ਦੋਸਤ ਜ਼ਿੰਦਗੀ 'ਚ ਆਏ , ਬੁਧੀਆਂ ਜਗਾਈਆਂ, ਖਿੱਚ-ਖਿਚਾ ਕੇ , ਸਮਝਾ-ਬੁਝਾ ਕੇ ਮੈਨੂੰ ਖੁੱਦ ਨੂੰ ਫੇਰ ਫੈਸਲਾ ਲੈਣ ਦਾ ਮੌਕਾ ਦਿੱਤਾ .....
ਫੇਰ ਮੈਂ ਵਾਪਿਸ ਮੁੜਿਆ ਤੇ ਸਫ਼ਰ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤਾ ਪੁਰਾਣੀ ਸੜਕ ਤੋਂ ਜਿਹੜੀ ਪੜਾਈ ਅੱਧ ਚ ਛੱਡੀ ਸੀ , ਦੁਬਾਰਾ ਬਸਤੇ ਫਰੋਲੇ, ਔਖੇ ਸੌਖੇ ਖਾਲਸਾ ਕਾਲਜ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਤੋਂ ਮਾਸਟਰ ਆਫ ਕਾਮਰਸ ਕੀਤੀ  ਵਾਰ ਵਾਰ ਪੁੱਛਿਆ "ਕਰਨਾ ਕੀ ਐ ,?"
ਜਵਾਬ ਆਇਆ "ਐਸੇ ਸਡ਼ਕ ਤੇ ਸਫ਼ਰ ਚ ਰਹਿਣਾ , ਅਦਾਕਾਰ ਬਣਨਾ , ਰੋਜ ਨਵਾਂ ਕਰਨਾ ਆ..."

ਬੱਸ ਐਨਾ ਸੋਚਣ ਦੀ ਲੋੜ ਸੀ ਕਿ ਆਪਣਿਆਂ ਦਾ ਸਾਥ ਤੇ ਮੋਹਬਤ ਸੜਕੋ ਸੜਕੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਲੈ ਆਈ , ਫੇਰ ਨਜ਼ਾਰੇ ਆਉਣੇ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਏ ,ਫੇਰ  #ਰੰਗਮੰਚ ਦੀ ਟੀਮ ਬਣੀ , ਸਫ਼ਰ ਹੋਰ ਸੁਹਾਵਣਾ ਹੋ ਗਿਆ , ਫੇਰ ਵਾਪਿਸ ਮੁੜਣ ਨੂੰ ਕਦੇ ਜੀ ਨੀ ਕੀਤਾ , ਸਫ਼ਰ ਜਾਰੀ ਰਖਿਆ ,
ਤੁਸੀਂ ਸਾਰੇ ਵੀ ਤਾਂ ਐਸ ਲੰਬੇ ਸਫ਼ਰ ਚੋਂ ਹੀ ਮਿਲੇ ਮੈਨੂੰ ......

ਦੋਸਤੋ ਇਸ ਲੰਬੇ 8-9  ਸਾਲਾਂ ਦੇ ਸਫਰ ਚ ਬਹੁਤ ਕੁੱਛ ￰ਵਾਪਰਿਆ, ਬਹੁਤ ਦੋਸਤ ਬਣੇ , ਬਹੁਤਿਆਂ ਨਾਲ ਨਜ਼ਦੀਕੀਆਂ ਵਧੀਆਂ , ਕੋਈ ਮੇਰੇ ਲਈ ਰੁਕਿਆ, ਕਈਆਂ ਲਈ ਮੈਂ ਰੁਕਿਆ , ਕੋਈ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਚਲਦਾ ਚਲਦਾ ਮੈਨੂੰ ਭੁੱਲ ਕੇ ਅੱਗੇ ਨਿੱਕਲ ਗਿਆ , ਕੋਈ ਹੱਥ ਫੜ ਕੇ ਨਾਲ ਤੁਰਿਆ , ਕੋਈ ਹੱਥ ਛੱਡ ਕੇ ਅੱਗੇ ਨਿਕਲ ਗਿਆ , ਕੋਈ ਨਾਲ ਚਲਦਾ ਚਲਦਾ ਵਾਪਿਸ ਮੁੜ ਗਿਆ , ਪਰ ਆਪਾਂ ਕਦੇ ਮੱਥੇ ਤਿਉੜੀ ਨੀ ਪਾਈ ....
ਹਾਂ ਬਹੁਤ ਜਣੇ ਨਰਾਜ ਕਰ ਬੈਠਾ , ਕਈਆਂ ਦੀਆਂ ਉਮੀਦਾਂ ਤੇ ਖਰਾ ਵੀ ਨੀ ਉਤਰਿਆ ,ਕਈਆਂ ਨੇ ਮੇਰੀਆਂ ਉਮੀਦਾਂ ਵੀ ਤੋੜੀਆਂ , .....

ਪਰ ਦੋਸਤੋ ਸਫਰ ਓਵੇਂ ਈ ਜਾਰੀ ਦਾ ਜਾਰੀ ਹੈ ਅੱਜ ਵੀ ਤੇ ਹਮੇਸ਼ਾ ਜਾਰੀ ਰਹੂ ਗਾ .....
"ਕੀ ਕਰਨਾ ਹੈ ?.." ਪਤਾ ਲੱਗ ਗਿਆ ਹੈ ..
ਹੋਣਾ ਕਦੋਂ ਐ ਇਹ ਸਫਰ ਤੇ ਮੇਹਨਤ ਨੇ ਈ ਤਹਿ ਕਰਨਾ ਹੈ ...

ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਆਹੀ ਕੀਤੀ ਐ ਕੇ ਕਿਸੇ ਤੋਂ ਕੋਈ ਓਹਲਾ ਨਾ ਰਖਾਂ ਕਿਸੇ ਨਾਲ ਧੋਖਾ ਨਾ ਕਰਾਂ , ਬੱਸ ਤੁਰਿਆ ਜਾਵਾਂ , ਰਾਹ ਚ ਤੁਸੀਂ ਸਾਰੇ ਕਿਸੇ ਨਾ ਕਿਸੇ ਮੋੜ ਤੇ ਆਪਣੇ ਆਪਣੇ ਸਫ਼ਰਾਂ ਤੇ ਜਾਂਦੇ ਮਿਲੋ , ਇੱਕਠੇ ਚਾਹਾਂ ਪੀਏ , ਨਜਾਰੇ ਲਈਏ , ਜਿਨਾ ਚਿਰ ਸਫ਼ਰ ਇੱਕਠਾ ਹੋਵੇ ਇਕੱਠੇ ਤਹਿ ਕਰੀਏ ਕਰੀਏ ਫੇਰ ਆਪਣੀ ਅਪਣੀ ਮੰਜ਼ਿਲ ਵੱਲ ਮੁੜ ਜਾਈਏ ,

ਸਫ਼ਰ ਦੇ ਦੌਰਾਨ ਜੋ ਜੋ ਵੀ ਦਿਲ ਚ ਵੱਸ ਗਿਆ , ਆਪਣੀ ਗਰੰਟੀ ਐ ਹਮੇਸ਼ਾ ਦਿਲ ਚ ਮਹਿਫ਼ੂਜ਼ ਰਹੂ ਗਾ , ਮਿਲਦੇ ਰਹਾਂ ਗੇ ਵਿਛੜਦੇ ਰਹਾਂ ਗੇ ...
ਪਰ ਦਿਲ ਚ ਰਹਾਂ ਗੇ..
ਸਫ਼ਰ ਚ ਰਹਾਂ ਗੇ..
ਨਜਾਰੇ ਲੈਂਦੇ ਰਹਾਂ ਗੇ ..

ਜੱਦ ਜੋ ਕਰਨਾ ਹੈ ਉਹ ਸੰਪੂਰਨ ਰੂਪ ਚ ਕਰ ਨੀ ਲੈਂਦੇ ....।
                   
                                           

Tuesday, 27 November 2018

नंगी आवाज़


वो आपको रोज़ नए तरीके से मिलेगी
रोज़ वो एक नई लड़की होगी
वो आपको रोज़ ठुकरायेगी
दिनों पे सालों साल भारी होगें
मेरी जान ये जो सारा फसाद है न हिस्ट्री का हैं
और ये सब मेरी जान मोमेंट्री आर्ट है
मैं एक ट्रैप में फंसा इंसान हूँ
आज भी गालों के खड्डों के बीच अटका इंसान
जानता हूँ रिपीट कुछ नही होता
रिपीट होता है तो 9 से 6 रगड़ने वाला इंसान
पढ़ सको तो समझना
फिर से किसी पहाड़ो में अटक जाएं
कोई बोनफायर चलाये ।
हर कोई सिगनिफिकेन्ट चाहता है
लेकिन तुम्हारी बातचीत ,बकबक सब मुझे मज़ा देती है
मेरी जान समझ सको तो समझना
मैंने बहुत कोशिश करके देखी
मुझे आज भी मेरी पहली मोहब्बत से वो मोहब्बत है
लाख ठकुराऐ , अनजान बना दे मोहब्बत तो मोहब्बत है
मेरी जान
ये ही तो ज़िन्दगी है अनएक्सपेक्टेड
पहली बार देखा तो अनजाना
फिर कुछ जान गया
फिर और ज्यादा जान गया
तुम किसी और से मिली
और मैं फिर से अनजाना
मेरी जाना मेरी आँखों में जो मोहब्बत तुमसे मिलने की जो ख़लिश वो सब कुछ समझो तो फिर से मिलना ।
मगर किसी तयशुदा मुलाकातों में नही बस यूं ही ,
किसी चौराहे पे
और बंद हो जाये किसी कमरे में
मेरी जान
समझना मेरी कल्पना को
जो तुमसे ही पैदा और बस गयी तेरे और मेरे बीच
लो मांन लिया कि मोहब्बत है मुझसे ज्यादा किसी और को तुमसे

मैं तुम्हारे प्यार में मर रहा हूँ
नही यार सतलुज की रानी
जमुना भी मुझे तवायफ़ सी लगी
कईओ की हवस अपने पास रखे बदबूदार होंकर भी पवित्र
क्योंकि वो सारे इल्ज़ाम खुद पर झेल रही है ।
लोगो की नाकामियों को खुद के माथे पर रगड़ें दौड़ती , और बहादुरी से चलती है ।
मेरे और तेरे बीच में यमुना का एक पुल् ही तो है
मैं ये पुल् कभी पार नही कर पाऊंगा ।
मेरा वजूद किनारों तक आ के सिमट जाता है ।
उस वक़्त मुझे तुम यमुना का पानी लगती हो ।
इंसान को भुलक्कड़ होना चाहिए ।

मैं चाहता हूँ कि मैं तुम्हारे अंदर कही जा के ठहर सकूँ जहां तक कोई ख्याल मुझे आ के तंग न करे ।
मैं वहाँ कोई कायर नही जीत में डूबा खुद को जमुना तैरता पाना चाहता हूँ ।

मैं आपसे मिलने के लिए मर रहा हूँ
नही तो

लेट मी डाई
मर रहा हूँ तो मरने दो
उसकी खातिर जो आपको सातवी कक्षा से सिर्फ जानता है , वो ये कभी नही जान पाएगा
कि तुम वो खाली सड़क में पीले से लिबास में कितनी ज्यादा खूबसूरत दिखती हो ।
वो कभी नही जान पायेगा
कि तुम द श और अ बोलते वक़्त थित्या जाती हो
वो कभी नही जान पायेगा कि उसके बाद और उससे पहले के बीचों बीच कोई तुमसे बेइंतहा मोहब्बत कर पाया है तो वो बदसूरत इंसान है
जिसकी औकात तुमने पानी पर गिरते पत्तों की तरह पाई।
जो बूंदे है
आखिरी कब तक बूंद पत्तो पर घर कर पाएगी ।

चलता हूँ मुझे बेचैनी हो रही है ।

मैं आज 3 बार बेहोश हुआ हूँ ।

जब मुझे मेरे होने न होने का होश न रहा ।

मैं उस पत्ते पर बूंद की तरह बेहोश हो कर ठहर जाना चाहता हूँ ।

तुम मुझे गिरने न देना

मेरी जान

कम से कम मेरे होश में वापस आने तक ।

नंगी आवाज़े

वो आपको रोज़ नए तरीके से मिलेगी
रोज़ वो एक नई लड़की होगी
वो आपको रोज़ ठुकरायेगी
दिनों पे सालों साल भारी होगें
मेरी जान ये जो सारा फसाद है न हिस्ट्री का हैं
और ये सब मेरी जान मोमेंट्री आर्ट है
मैं एक ट्रैप में फंसा इंसान हूँ
आज भी गालों के खड्डों के बीच अटका इंसान
जानता हूँ रिपीट कुछ नही होता
रिपीट होता है तो 9 से 6 रगड़ने वाला इंसान
पढ़ सको तो समझना
फिर से किसी पहाड़ो में अटक जाएं
कोई बोनफायर चलाये ।
हर कोई सिगनिफिकेन्ट चाहता है
लेकिन तुम्हारी बातचीत ,बकबक सब मुझे मज़ा देती है
मेरी जान समझ सको तो समझना
मैंने बहुत कोशिश करके देखी
मुझे आज भी मेरी पहली मोहब्बत से वो मोहब्बत है
लाख ठकुराऐ , अनजान बना दे मोहब्बत तो मोहब्बत है
मेरी जान
ये ही तो ज़िन्दगी है अनएक्सपेक्टेड
पहली बार देखा तो अनजाना
फिर कुछ जान गया
फिर और ज्यादा जान गया
तुम किसी और से मिली
और मैं फिर से अनजाना
मेरी जाना मेरी आँखों में जो मोहब्बत तुमसे मिलने की जो ख़लिश वो सब कुछ समझो तो फिर से मिलना ।
मगर किसी तयशुदा मुलाकातों में नही बस यूं ही ,
किसी चौराहे पे
और बंद हो जाये किसी कमरे में
मेरी जान
समझना मेरी कल्पना को
जो तुमसे ही पैदा और बस गयी तेरे और मेरे बीच
लो मांन लिया कि मोहब्बत है मुझसे ज्यादा किसी और को तुमसे

मैं तुम्हारे प्यार में मर रहा हूँ
नही यार सतलुज की रानी
जमुना भी मुझे तवायफ़ सी लगी
कईओ की हवस अपने पास रखे बदबूदार होंकर भी पवित्र
क्योंकि वो सारे इल्ज़ाम खुद पर झेल रही है ।
लोगो की नाकामियों को खुद के माथे पर रगड़ें दौड़ती , और बहादुरी से चलती है ।
मेरे और तेरे बीच में यमुना का एक पुल् ही तो है
मैं ये पुल् कभी पार नही कर पाऊंगा ।
मेरा वजूद किनारों तक आ के सिमट जाता है ।
उस वक़्त मुझे तुम यमुना का पानी लगती हो ।
इंसान को भुलक्कड़ होना चाहिए ।

मैं चाहता हूँ कि मैं तुम्हारे अंदर कही जा के ठहर सकूँ जहां तक कोई ख्याल मुझे आ के तंग न करे ।
मैं वहाँ कोई कायर नही जीत में डूबा खुद को जमुना तैरता पाना चाहता हूँ ।

मैं आपसे मिलने के लिए मर रहा हूँ
नही तो

लेट मी डाई
मर रहा हूँ तो मरने दो
उसकी खातिर जो आपको सातवी कक्षा से सिर्फ जानता है , वो ये कभी नही जान पाएगा
कि तुम वो खाली सड़क में पीले से लिबास में कितनी ज्यादा खूबसूरत दिखती हो ।
वो कभी नही जान पायेगा
कि तुम द श और अ बोलते वक़्त थित्या जाती हो
वो कभी नही जान पायेगा कि उसके बाद और उससे पहले के बीचों बीच कोई तुमसे बेइंतहा मोहब्बत कर पाया है तो वो बदसूरत इंसान है
जिसकी औकात तुमने पानी पर गिरते पत्तों की तरह पाई।
जो बूंदे है
आखिरी कब तक बूंद पत्तो पर घर कर पाएगी ।

चलता हूँ मुझे बेचैनी हो रही है ।

मैं आज 3 बार बेहोश हुआ हूँ ।

जब मुझे मेरे होने न होने का होश न रहा ।

मैं उस पत्ते पर बूंद की तरह बेहोश हो कर ठहर जाना चाहता हूँ ।

तुम मुझे गिरने न देना

मेरी जान

कम से कम मेरे होश में वापस आने तक ।

Thursday, 22 November 2018

दुल्हनें

बच्चे को एक खिलौना पसंद आया और उसे मिल गया ।
बच्चे को लगने लगा कुछ भी चाहो तो मिल जाता है ।
उसने हर एक चीज को खिलौना मानना शुरू कर दिया ।
दुनिया की हर चीज़ खिलौना ।
खेल , भूख , प्यास सब खिलौने ।
फिर उसकी भूख एक औरत बनी ।
माना जाता है कि जब खिलौना खरीद लिया जाता तो वो अपना हरजाईपन खो देता है ।
जब जब वो खिलौने को खूबसूरत देखता उसके साथ सो जाता और अगले एक साल तक उस खिलौने से वंचित हो जाता । फिर वो और खिलौने ले आता उसके कई सौ खिलौने हो जाते । करते करते अब उसे समझ आया कि हर चीज़ खिलौना नही होती । तब तक कितने खिलौने नष्ट कर दिए ।
किसी भी औरत से इश्क़ किया जाए
तिगड़ा एक ही किस्म का बनता है
हुस्न
इश्क़
और मौत
आशिक़ , माशूक और मिलन

जब भूख खत्म होती प्रेम में हार - जीत एक सामान है ।
बच्चा बड़े हो जाते है ।
आदमी आदमी ही रहता है
जब पूर्णता हाथ लगती है
तो वास्तविकता कहीं खो जाती है ।

मेहबूब से मिलन की लिए जरूरी नही
के वो मौजूद हो
खुद आशिक़
खुद माशूक
और खुद में खुद का मिलना
बस उसने भूख और इश्क़ को इतना जाना ।
खिलौने की भूख थी और
प्रेम भूख नही ।
क्योंकि प्रेम वो फूल है ....
जिसे तोड़ा नही जाना चाहिए ।
तुम्हारी हँसी भी फूलों जैसी है
जो भी तुम्हे तोड़ेगा और तुम्हारी खूबसूरती से खेल कर दुनिया में जा बोलेगा ।
मेरा खिलौना अब संपूर्ण हुआ ।
समझ लेना फूल तोड़ दिया गया
ख़ुशबू गायब न ही तितलियां दोस्त रहेंगी
और न ही भँवरे हँसेंगे ।
बच्चा कोई और खिलौना खरिदने बाहर दौड़ेंगे ।

Sunday, 15 April 2018

ਐਵੀਂ ਚੋਰੀ ਚੋਰੀ

ਦਿੱਲੀ ਆਏ ਨੂੰ 6 ਮਹੀਨੇ ਹੋ ਗਏ । 2011 ਤੋੰ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਨਾਲ ਮੈਂ ਖੇਡ ਰਿਹਾ ਤੇ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਖੇਡ ਰਹੀ ਹੈ । ਜਿੰਦਗੀ ਹਰ ਵਾਰ ਮੇਰੇ ਸਾਹਮਣੇ ਕੁਝ ਨਵਾਂ ਪਰੋਸ ਕੇ ਰੱਖਦੀ ਹੈ ਤੇ ਮੈਂ ਕਿਸੇ ਜ਼ਿੱਦੀ ਨਿਆਣੇ ਵਾੰਗੂ ਅੱਖਾਂ ਤੋਂ ਓਹਲੇ ਕਰਦਾ ਜਾਣਾ ਆ ।

" ਕਿਉਂ " ਦਾ ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਜਵਾਬ ਨਹੀਂ । ਹਰ ਸ਼ੈ ਦੇ ਲਈ ਰੜਕ ਰੱਖ ਕੇ ਉਹਨੂੰ ਪਾਉਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕੀਤੀ , ਇੱਕ ਵਕ਼ਤ ਦੇ ਬਾਅਦ ਜਦੋਂ ਜਦੋ ਜਹਿਦ ਇੰਨੀ ਕੁ ਵੱਧ ਜਾਣੀ ਗੱਲ ਫਿਰ ਜਰੂਰਤ ਦੀ ਨਹੀਂ` ਖ਼ਵਾਹਿਸ਼ ਤੇ ਆ ਬਹਿਣੀ । ਕਦੋ ਇਹ ਸਭ ਮੇਰੇ ਹੱਡਾ ਵਿੱਚ , ਰੂਹ ਵਿੱਚ ਤੇ ਹੁਣ ਇਹ ਸਭ ਮੇਰੀ ਆਦਤ ਬਣ ਗਿਐ ।

ਕੋਈ ਚੀਜ਼ ਸੌਖੀ ਮਿਲ ਜਾਵੇ ਤੇ ਚੈਨ ਨਹੀਂ ਮਿਲਦਾ ।
ਮੈਂ ਪਿਛਲੇ ਸੱਤਾ ਸਾਲਾਂ ਦੀ ਵਹੀ ਖੋਲਾ`  ਤਾਂ ਦੇਖਦਾ ਦੌੜ ਭੱਜ ਤੇ ਹਰ ਚੀਜ਼ ਤੋ ਨੱਠਦਾ ਹੀ ਰਿਹਾ ।
ਮੈਂ ਕਦੇ ਕੋਈ ਪੰਜਾਬੀ ਦੀ ਕਿਤਾਬ ਨਹੀਂ ਪੜ੍ਹੀ | ਇੱਕ ਸੱਚ ਮੰਨਾ ਤੇ , ਹਾਂ ਨਾਨਕ ਸਿੰਘ ਦੀਆਂ 2-4 ਨਾਵਲ ਪਡ਼ੇ , ਓਹਦੇ ਇਲਾਵਾ ਕਦੀ ਕੋਈ ਕਿਤਾਬ ਨਹੀਂ ਪੜੀ । ਹਾਂ ਹਿੰਦੀ ਤੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਦੀਆਂ ਕਿਤਾਬਾਂ ਹਰ ਵੇਲੇ ਮੇਰੇ ਬਸਤੇ ਵਿਚ ਹੁੰਦੀਆਂ ਵਕਤ ਮਿਲੇ ਤਾਂ ਕਦੇ ਕਦਾਈਂ  ਇੱਕ ਵਾਰ ਚ ਹੀ ਪੂਰੀ ਕਿਤਾਬ ਖ਼ਤਮ ``` ਨਹੀਂ ਤਾਂ 6 ਮਹੀਨੇ ਲਗਦੇ ਖ਼ਤਮ ਕਰਨੇ ਨੂੰ ।'''

ਸੋਸ਼ਲ ਮੀਡੀਆ ਤੇ ਬਣੇ ਰਹਿਣਾ ਵੀ ਉਹੀ ਗੱਲ ਜਦੋ ਜਹਿਦ ਹੀ ਹੈ । ਢੰਗ ਦਾ ਫੋਨ ਮੇਰੇ ਕੋ ਸਾਲ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਆਇਆ । ਉਹਤੋਂ ਪਹਿਲਾ ਯਾਰ ਬੇਲੀ ਜ਼ਿੰਦਾਬਾਦ ।
ਕੱਲੇ ਹੋਣ ਕਰਕੇ ਗੱਲਾਂ ਬਾਤਾਂ ਲਈ ਇੱਕ ਸੌਖਾ ਰਾਹ ਲੱਭਿਆ , ਬਲੌਗ ਲਿਖਣਾ । ਕੁਝ ਵੀ ਲਿਖਣਾ ਹੋਵੇ ਜਾਂ ਸੋਚਣਾ ਹੋਵੇ ਮੈਂ ਹਮੇਸ਼ਾ ਪੰਜਾਬੀ ਵਿੱਚ ਹੀ ਸੋਚਿਆ । ਮੈ ਕਿਸੇ ਦਾ ਦਿਲ ਜਿੱਤਣ ਲਈ ਨਹੀਂ ਸੀ ਲਿਖਣਾ ਚਾਉਂਦਾ , ਮੈਂ ਤਾਂ ਬੱਸ ਇਕ ਰੂਹ ਦੀ ਤੱਸਲੀ ਲਈ ਲਿਖਦਾ ਸੀ , ਯਾਰ ਬੇਲੀ ਨੇ ਕਹਿਣਾ ਵਕ਼ਤ ਜਾਇਆ ਕਰਦਾ , ਮੈਂ ਕਿਸੇ ਦੀ ਕਦੇ ਕੋਈ ਗੱਲ ਨਹੀਂ ਮੰਨੀ ।
ਚੀਜ਼ ਕੋਈ ਵੀ ਹੋਵੇ ਮੈਂ ਉਮਰ ਦੀਆਂ ਲੀਕਾਂ ਮਿਟੇ ਕੇ ਜਿੰਨੀ ਕੁ ਸਮਝ ਕਮਾਈ ਓਹਦੀ ਹੀ ਕਮਾਈ ਖੱਟੀ , ਗਵਾਇਆ ਬਹੁਤ ਹੈ , ਕਮਾਏ ਦਾ ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਹਿਸਾਬ ਨਹੀਂ ।
ਬੱਸ ਮੈਂ ਆਪਣਾ ਵਕ਼ਤ ਦਿੱਤਾ , ਜਿਸ ਨੂੰ ਮਨ ਕੀਤਾ ਓਹੀ ਕਰਨੇ ਨੂੰ ਤੁਰ ਪਿਆ । ਸਿਆਣੇ ਕਹਿੰਦੇ ਹੈ ਰੋਏਗਾ ।
ਇਕ ਵਾਰ ਸਿਆਣੇ ਦੀ ਮੰਨ ਕੇ ਦੁਨੀਆ ਨੇ ਜੋ ਲੀਕ ਖਿੱਚੀ ਐ ਨਾ ਕੇ ਫਿਰ ਏਦਾ , ਫਿਰ ਓਦਾ !
ਮੈਂ ਵੀ ਸਿਆਣਾ ਜਾ ਬਣ ਕੇ ਇੱਕ ਸਮੇਂ ਦੀ ਟਿਕ ਟਿਕ ਤੇ ਜਿਓਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤਾ । ਬਹੁਤ ਸੌਖਾ ਸੀ ਪਰ ਕੀਂ ਕਰਦਾ ਮੈਨੂੰ ਜਾਪੇ ਜਿਵੇਂ ਮੈਂ ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਈ ਮੰਗਲ ਸ਼ੁਕਰ ਤੇ ਆਂ ਬੈਠਾ ਹੋਵਾਂ । ਹੌਲੀ ਹੌਲੀ ਇੱਕ ਦਿਨ ਉਹ ਦੁਨੀਆ ਦੀ ਕੰਧ ਟੱਪ ਕੇ ਮੈਂ ਆਪਣੀ ਰੂਹ ਦੀ ਆਵਾਜ਼ ਸੁਣ ਕੇ ਅਪਣੇ ਹੀ ਓਸੇ ਮੁਲਕ ਵਿੱਚ ਆ ਬੈਠਾ , ਜਿਥੇ ਖੁਸ਼ੀ ਹੋਣ ਲਈ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਬਿੱਲ ਨਹੀਂ ਤਾਰਨਾਂ ਪੈਂਦਾ ਬਸ ਹੱਡ ਪੈਰ ਦੇ ਜੋਰ ਤੇ ਹੀ ਸਭ ਹਾਸੇ ਤੇ ਰੋਣੇ ਐ , ਹਾਸੇ ਵਿੱਚ ਰੋਣਾ ਤੇ ਰੋਣੇ ਵਿਚ ਹੀ ਹਾਸਾ । ਹਾਂ ਮੈਨੂੰ ਪਤਾ ਤੁਸੀਂ ਸਮਝਣਾ ਇੰਨਾ ਬੋਡਾ ਹੋ ਗਿਆ ਤੇ ਕੀਂ ਲਿਖ ਰਿਹਾ । ਫਿਰ ਉਹੀ ਹੋਇਆ ।
ਮੈਂ ਫਿਰ ਲੀਕਾਂ ਤੇ ਜਿਓਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ।
6 ਮਹੀਨੇ ਤੋਂ ਆਪਣੇ ਦਿੱਲ ਤੇ ਰੂਹ ਕਿਸੇ ਲਾਲ ਕੱਪੜੇ ਵਿੱਚ ਬੰਨ ਕੇ ਕਿਤੇ ਸੁੱਟ ਆਇਆ ।
ਪਰ ਚੋਰੀ ਚੋਰੀ ਦਫਤਰ ਦੀ ਇੱਕ ਚੂੰਡ ਵਿੱਚ ਬੈਠਾ ਜੇ ਕੋਈ ਖਾਲੀ ਵਰਕਾ ਮਿਲਦਾ ਤੇ ਆਪਣੀ ਗੁਆਚੀ ਰੂਹ ਦੇ ਨਾਮ ਕੋਈ ਨਾ ਕੋਈ ਖ਼ਤ ਪਾਉਂਦਾ ਰਹਿੰਦਾ । ਮੈ ਜਿਸ ਦੁਨੀਆ ਤੋਂ ਹਾਂ ਮੈਂ ਇਹਦਾ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਪਤਾ ਨਹੀਂ ਲੱਗਣ ਦਿੱਤਾ ਪਰ ਈ-ਮੇਲ , ਫੋਨ , ਸੋਸ਼ਲ ਮੀਡੀਆ ਦੇ ਦੌਰ ਵਿੱਚ ਜਦੋਂ ਮੈਨੂੰ ਕੋਈ ਕਿਸੇ ਕਾਗਜ਼ ਤੇ ਲਿਖਦੇ  ਨੂੰ ਵੇਖਦੇ ਤੇ ਉਹ ਸਮਝ ਗਏ ਕੇ ਇਹ ਤਾਂ ਉਹੀ ਹੈ ।
ਕਈਆਂ ਨੇ ਰਹਿਮ ਭਰਿਆ ਤੇ ਕਈਆਂ ਨੇ ਸੁਆਲ ਪਾਏ ਪਰ ਮੈਂ ਮੁਕਰਦਾ ਰਿਹਾ ਮੈਂ ਰਹਿਮ ਵਾਲਿਆ ਤੇ ਸੁਆਲ ਵਾਲਿਆ ਨੂੰ ਕੋਈ ਜਵਾਬ ਨਾ ਦਿੱਤਾ ਤੇ ਕਾਗਜ਼ ਤੇ ਲਿਖਦਾ ਰਿਹਾ , ਇਕ ਦਿਨ ਰਹਿਮ ਵਾਲਿਆ ਨੇ ਮੇਰੀਆਂ ਰੂਹ ਨਾਲ ਕਾਗਜ਼ ਤੇ ਕੀਤੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਪਡ਼ ਕੇ ਕਿਸੇ ਰਸਾਲੇ ਨੂੰ ਭੇਜ ਕੇ ਛਾਪ ਦਿੱਤੀਆਂ , ਮੈਨੂੰ ਓਹਦੇ ਪੈਸੇ ਮਿਲੇ ਤੇ ਓਹਨਾ ਦੇ ਮੈਂ ਮੁੱਲ ਦੇ ਹਾਸੇ ਲੈ ਕੇ ਆਇਆ ਮੈਂ ਰੋਂਦਾ ਰਿਹਾ ਤੇ ਲੋਕ ਗੱਲਾਂ ਸੁਣ ਕੇ ਹੱਸਦੇ ਰਹੇ । ਹੁਣ ਮੈਂ ਲੂਕ ਲੂਕ ਕੇ ਰੂਹ ਨਾਲ ਗੱਲਾਂ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ ਓਹਨੂੰ ਖ਼ਤ ਪਾਉਣਾ ਪਰ ਓਹ ਜਵਾਬ ਨਹੀਂ ਦਿੰਦੀ , ਉਹ ਖਾਮੋਸ਼ ਹੈ , ਉਹ ਚੁੱਪ ਵੱਟ ਬੈਠੀ ਹੈ ।
ਉਹ ਨਰਾਜ਼ ਹੈ , ਖੌਰੇ ਇਸ ਲਈ ਕੇ ਮੈਂ ਉਹਨੂੰ ਓਸੇ ਮੁਲਕ ਚ ਛੱਡ ਆਇਆ ਸਾਂ ਤਾਂ ਕਰਕੇ ......
ਮੈਂ ਫਿਰ ਖਮੋਸ਼ ਹੋ ਗਿਆ , ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਥੋੜੇ ਦਿਨ ਬਾਕੀ ਨੇ ਮੈਂ ਛਾਲ ਮਾਰ ਓਸੇ ਮੁਲਕ ਚ ਵਾਪਸ ਪਰਤ ਜਾਣਾ ਰੂਹ ਦੇ ਕੋਲ । ਹੁਣ ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਇੰਨਾ ਕਾਗਜ਼ ਹੈ ਕੇ ਮੈਂ ਰੂਹ ਨਾਲ ਬਹੁਤ ਗੱਲਾਂ ਕਰ ਸਕਦਾ ਪਰ ਓਹ ਚੁੱਪ ਤੇ ਉਦਾਸ ਹੈ ।
ਮੈਂ ਕਿਸੇ ਦਾ ਮਨ ਭਾਉਣ ਲਈ ਨਹੀਂ ਆਪਣੀ ਰੂਹ ਦੀ ਖੁਸ਼ੀ ਲਈ ਓਹਦੇ ਨਾਲ ਹਰ ਗੱਲ ਕਰਨੀ ਹੈ ।
ਮੈਂ ਛੇਤੀ ਮੁੜ ਆਉਣਾ ਤੇਰੀ ਦੁਨੀਆ ਦੇ ਵਿੱਚ
ਮੇਰੀ ਰੂਹ
ਮੈ ਤੇਰਾ
ਪੰਕਜ ਸ਼ਰਮਾ

Thursday, 12 April 2018

ਇਲਜ਼ਾਮ

ਮੈਂ ਫਿਰ ਤੈਨੂੰ ਮਿਲਣ ਆਇਆ ..

ਮੈਂ ਇਸ ਵਾਰ ਕਿਸੇ ਦੇ ਇਸ਼ਕ਼ ਚ ਹੋਈਆਂ ਸਿਖਰ ਦੀਆਂ ਹਾਰਾਂ ਦੀ ਗੱਲ ਨਹੀਂ ਕਰਨ ਆਇਆ |

ਨਾ ਹੀ ਕਿਸੇ ਬਾਗ ਬੋਤੇ ਚ ਉੱਡਦੀਆਂ ਤਿੱਤਲੀਆਂ ਦੀ ਗੱਲ ਕਰਨੀ ਹੈਂ ..

ਨਾ ਕਿਸੇ ਮੀਹ ਪਾਏ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਦੀ ਖੁਸ਼ਬੂ ਦੀ ਨਾ

ਕਿਸੇ ਹੀਰ ਦੇ ਰੰਗ ਦੀ 

ਨਾ ਹੀ  ਗੁੰਦਵੇਂ ਸਰੀਰ ਨੂੰ ਕਾਣੀ ਅੱਖ ਨਾਲ ਮਾਪਦੀਆਂ ਛਾਤੀਆਂ ਦੀ ..

ਮੈਂ ਤੈਨੂੰ ਦੱਸਣਾ ਹੈਂ ਕਿ ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਆਖ਼ਣੈ ਲਈ ਕੱਖ ਨਹੀਂ ਬਚਿਆ |

ਮੈਂ ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੇ ਕੌਮੇਂ  ਬਿੰਦੀਆਂ ਟਿੱਪੀ ਤੇ ਅੱਦਕ ਨੂੰ ਗੁਵਾ ਬੈਠਾ ਹਾਂ |

ਮੈਂ ਨਿਹੱਥਾ ਤੇ ਦਿਵਾਲੀਆ ਹੋ ਗਿਆ |

ਮੇਰੀ ਇਸ ਹਾਲਾਤ ਦਾ ਜਿੰਮੇਵਾਰ ਵੀ ਤੂੰ ਹੀ ਹੈ |

ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਬਸ ਇਲਜ਼ਾਮ ਦੀ ਗੱਡਰੀ ਹੈ ਜਿਸ ਵਿਚ ਸਾਰੇ ਦੋਸ਼ ਅਤੇ ਕਾਰਨ ਤੇਰੇ ਮੱਥੇ ਮੜ੍ਹਨੇ  ਨੇ |

ਪਤਾ ਹੈਂ ਤੂੰ ਨਾ ਨੁੱਕਰ ਕਰੇਗੀ ਪਰ |

ਮੇਰੀ ਮੈਟ ਮਾਰੀ ਗਈ ਹੈਂ |

ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਤੇਰੀ ਝੋਲੀ ਪਾਉਣ ਲਈ ਕੁਛ ਨਹੀਂ ਸੀ ਪਰ ਅੱਜ ਇਲਜ਼ਾਮ ਨੇ |

ਆ ਬੈਠ ਤੇ ਆਪਣਾ ਹੱਥ ਮੇਰੇ ਹੱਥਾਂ ਵਿਚ ਦੇ 

ਮੈਂ ਤੇਰੇ ਹੱਥਾਂ ਦੀਆਂ ਉਂਗਲਾਂ ਤੇ ਤੇਰੇ ਇਲਜ਼ਾਮ ਧਾਰ ਕੇ ਤੈਨੂੰ ਦੱਸਣਾ ਹੈ |

ਮੈਂ ਹੁਣ ਸ਼ਬਦ ਤੋਂ ਵਾਂਝਾ ਹਾਂ 

ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਕੋਈ ਗੁਣਗੁਣਾਉਂਦੀ ਕਵਿਤਾ ਨਹੀਂ ਸੀ 

ਜਿਹਨੂੰ ਬੋਲ ਕੇ ਮੈਂ ਤੈਨੂੰ ਮੋਹ ਲੈਂਦਾ |

ਅੱਜ ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਨਾ ਹੀ ਕਵਿਤਾ ਹੈਂ

 ਤੇ ਨਾ ਹੀ ਕੋਈ ਕਹਾਣੀ 

ਤੂੰ ਜੋ ਅੱਖਾਂ ਭਰ ਕੇ ਵਾਲ ਵੇਖਦੀ ਤੇ ਸ਼ਾਇਦ ਕੋਈ ਕਹਾਣੀ ਜਾਂ ਕਵਿਤਾ ਨੇ ਜਨਮ ਲਈ ਲੈਣਾ ਸੀ | ਮੈਂ ਕੋਈ ਲਿਖਾਰੀ ਨਹੀਂ ਬਣਨਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਸੀ ਨਾ ਕੋਈ ਅਦਾਕਾਰ  |

ਤੇ ਨਾ ਹੀ ਕੋਈ ਮਸ਼ੀਨਾਂ ਤੇ ਬਟਨ ਨੂੰ ਕੁੱਟਦਾ ਕੋਈ ਕਾਰੀਗਰ ਮੈਂ ਤਾਂ ਇਕ ਮਜਦੂਰ ਬਣਨਾ ਚਾਉਂਦਾ ਸੀ ਜੋ ਤੇਰੇ ਨਕਸ਼ ਨੂੰ ਤਸਵੀਰਾਂ  ਵਿਚ ਬੰਨ ਸਕੇ ਤੇ ਲਫ਼ਜ਼ ਦੀ ਮਾਲਾ ਦਾ ਮਾਲਾ ਬਣਾ ਕੇ ਤੈਨੂੰ ਇਕ ਰਾਣੀ ਹਰ ਬਣਾ ਕੇ ਤੇਰੇ ਸਰ ਸਜਾ ਸਕੇ | ਪਰ ਜੋ ਚਾਉਂਦਾ ਸੀ ਕੋਈ ਕਲਪਨਾ ਜਾਂ ਖਿਆਲ ਹੀ ਰਹਿ ਗਿਆ |

ਤੇਰੀ ਤੇ ਮੇਰੀ ਮੁਲਾਕਾਤਾਂ ਦਾ ਦਿਨ ਯਾਦ ਕਰਦਾ ਹਾਂ ਤਾਂ ਸਾਰੇ ਵਾਰ ਬੇਧਿਆਨੇ ਲਗਦੇ ਨੇ |

ਐਤਵਾਰ ਜਾਂ ਸ਼ਨੀਵਾਰ ਪਰ ਇੱਦਾ ਲੱਗਦੇ ਨੇ ਇਹ ਵੀ ਸੋਮਵਾਰ ਦੇ ਭੇਸ ਵਿਚ ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਆਏ ਹੋਣ |

ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਖਾਲੀ ਕਾਗਜ਼ ਦੀ ਇਕ ਢੇਰੀ ਬਾਕੀ ਹੈਂ |

ਤੈਨੂੰ ਖੁੱਲੇ ਗਿੱਲੇ ਵਾਲਾਂ ਵਿਚ ਵੇਖਦਾ ਤਾਂ ਸ਼ਾਇਦ ਤੇਰੇ ਲਈ ਕੁਝ  ਲਿਖ ਪਾਉਂਦਾ |

ਪਰ ਹੁਣ ਸਭ ਦੇ ਵਿਚ ਨਾ ਹੀ ਕੋਈ ਫਿਲਾਸਫੀ ਜਾਂ ਫ਼ਲਸਫ਼ਾ ਨਹੀਂ 

ਕੋਈ ਤਾਰੀਫ ਕੋਈ ਬਦਤਮੀਜ਼ੀ ਜਾਂ ਅਸ਼ਲੀਲਤਾ ਵੀ ਨਹੀਂ 

ਮੇਰੇ ਸ਼ਬਦ ਅਪਾਹਜ਼ ਹਨ 

ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਕੋਲ ਬਿਨਾ ਸਿਰ ਪੈਰ ਤੇ ਗੂੰਗੇ ਲਫ਼ਜ਼ਾਂ ਕੋਲ ਕੀਤੇ ਪਹੁੰਚਣ ਦੀ ਆਸ ਨਹੀਂ |

ਪਰ ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਇਕ ਰੂਹ ਹੈਂ ਜੋ ਮੇਰੇ ਹਰ ਲਫ਼ਜ਼ ਦੇ ਅੰਦਰ ਮੇਰੇ ਤੇ ਤੇਰੇ ਹੋਣ ਦਾ ਅਹਿਸਾਸ ਹੈਂ |

ਮੇਰੇ ਲਈ ਸਭ ਖਾਸ ਹੈ  

ਮੇਰੀ ਹਰ ਕਵਿਤਾ ਸੋਹਣੀ ਹੈ ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਵਾਂਗਰਾ |

ਤੂੰ ਮੇਰੇ ਹਰ ਲਫ਼ਜ਼ ਵਿਚ ਜਿਓਂਦੀ ਹੈ 

ਇਹ ਸੱਚ ਹੈਂ ਇਸ ਵਿਚ ਨਾ ਕੋਈ ਸੰਗ ਹੈਂ 

ਮੇਰੇ ਹਰ ਲਫ਼ਜ਼ ਵਿਚ ਤੇਰੀ ਰੂਹ ਹੈਂ 

ਜਦੋ ਤੱਕ ਕੁਝ ਲਿਫ਼ਦਾ ਜਾਵਾਂਗਾ 

ਸਮਝਣਾ ਕਿ ਤੂੰ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਹੈਂ |

Tuesday, 13 March 2018

जादू

कुछ ऐसा कहूँ जो आखिर तक तुम्हे याद रहे ...
तुम जब भी कभी उदास हो तो लफ्ज़ मेरे खुद में दोहराओ और सब बदल जाये ....
जब तुम बस मुस्कराओ
जैसे कोई जादू हो जाये

ऐसी कोई बात तुम्हे लिख पाता तुम ...
एक पेंसिल से अंडरलाइन करती
खोलो वो किताब
तो पहले वो नज़र आये
गर तुम पढ़ते पढ़ते खो जाओ
जैसे कोई जादू हो जाये

कोई ऐसा तोहफा दे स्कू
जिसे देख तुम मुझे याद रख पाओ
तुम पास उसे पाओ
तो मुझे याद कर पाओ
जैसे कोई जादू हो जाये ....

कोई ऐसी मुलाकात हो जाये
मैं दूर कही गर निकल जाऊं
बस याद पास तुम्हारे रह जाये
जिसे तुम भी याद कर पाओ
जैसे कोई जादू हो जाये

कुछ ऐसा हो जिसे
मैं देख पाऊँ
तुम देख पाओ
उम्र बीत जाए
वक़्त गुज़र जाए
तुम सामने होते मेरे
मैं देख पाऊँ तुम्हे
जब भी जी चाहे ....
ऐसा कोई जादू हो जाए...


Tuesday, 20 February 2018

लफ़्फ़ाज़ियाँ

रिश्ते और रास्तों के बीच के अजीब सा रिश्ता होता हैं
कभी कभी रिश्तो से रास्ते मिल जाते हैं
कभी कभी रास्तों में रिश्ते बन जाते हैं

तुमसे मोहब्बत  कर बैठा था ,
पर क्यों करूँ मैं  मलाल
मैं मोहब्बत बोलता रहा
तुम फितूर समझती रही
कुछ मैं मेरा, तुम अपना
कसूर समझती रही

मैं शौंक के लिए नहीं तुम लिखता हूँ
जब भी तुम पे आ उलझता  हूँ
तुम यहाँ आ के सुलझाता हूँ
तुम मनाता हूँ |

पर क्या करू मलाल तो
यूँ हज़ार बार भी टूटे या रूठे मना लूँगा तुझे
 मगर देख तेरी मेरी मोहब्बत में शामिल कोई दूसरा न हो |

तुम मानो सवाल से भी गहरी लगती हो
कितना भी पोलिटिकल हो जाऊं
तुम पे आ के पोएटिकल हो जाता हूँ

लफ्ज़ ढूंढने लगता हूँ
कहने को बहुत कुछ होता है
पर रात ख़त्म होते ही ख्वाब भी टूटने लगता है

कभी न मैंने सोचा के तुम मुझे क्यों अच्छी लगती हो
तुम नाराज़ भी अच्छी लगती हो
हँसती  हो तो अच्छी लगती हो
जब बात करती हो तो अच्छी लगती हो
पास हो तो अच्छी लगती हो
आज दूर हो तो अच्छी लगती हो

अब तुम आदत हो
पागलपन हो
ज़िद्द हो
कल्पना हो
हक़ीक़त हो

तुम ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

चलो फिर कभी अब चलता हूँ |
अब होली पे मिलते हैं

Thursday, 15 February 2018

ਵਾਕਿਫ

ਐਨਕਾਂ ਕਦੋ ਦੀਆਂ ਲੱਗ ਗਈਆਂ ?
- ਐਨਕਾਂ -hmmmmmmm.....!!!
ਹਾਂ ਐਨਕਾਂ |
- ਦੋ ਸਾਲ ਹੋ ਗਏ ... ਲਾਉਂਦੀ ਨੂੰ 
ਵੈਸੇ ਕਿਉਂ ਪੁੱਛਿਆ ???
ਸਿਆਣੀ ਜਈ ਲੱਗਣ ਲੱਗ ਪਈ ਹੈ ।
- ਓੰ ... ਤੇ ਪੰਜ ਸਾਲ ਪਹਿਲਾਂ ਮੈਂ ਸਿਆਣੀ ਨਹੀਂ ਸੀ ਲੱਗਦੀ ?
ਹਾਹਾਹ੍ਹਾ !! ਨਹੀਂ ਓਦੋਂ ਵੀ ਸਿਆਣੀ ਸੀ 
ਹੁਣ ਜ਼ਿਆਦਾ ਸਿਆਣੀ ਲੱਗਣ ਲੱਗ ਪਈ ਐ ।
-ਤੇ ਤੂੰ ਦਾੜੀ ਕਿਉਂ ਰੱਖ ਲਈ ?
ਥੋੜਾ ਜਿਹਾ ਪਾਗਲ ਦਿਸਣ ਲਈ ।
-ਅੱਛਾ 
ਕੀਂ ਅੱਛਾ ???
-ਵੈਸੇ ਪੰਜ ਸਾਲ ਪਹਿਲਾਂ ਵੀ ਪਾਗਲ ਹੀ ਸੀ ।
ਤੇ ਹੁਣ ???
- ਹੁਣ ਜ਼ਿਆਦਾ ਪਾਗਲ ਦਿਸਣ ਲੱਗ ਪਿਆ ਐ ।
ਤੂੰ ਪਹਿਲਾ ਵੀ ਮੂੰਹ ਫੱਟ ਸੀ ਤੇ ਹੁਣ ਵੀ
-ਤੂੰ ਪਹਿਲਾਂ ਵੀ ਚੁੱਪ ਵੱਟ ਸੀ ਤੇ ਹੁਣ ਵੀ ।
ਆਪਾਂ ਦੋਵੇ ਕਦੀ ਇੱਕ ਦੂਜੇ ਲਈ ਸੀ ਹੀ ਨਹੀਂ ।
- "ਮੇਡ ਫਾਰ ਇਚ ਅੱਦਰ" ਵੀ ਨਹੀਂ
ਪ੍ਰਿੰਸ ਪ੍ਰਿੰਸਸ ਵੀ ਨਹੀਂ
ਆਪਾਂ ਬੱਸ ਗ਼ਲਤ ਤੇ ਠੀਕ ਸੀ 
ਕਦੀ ਤੂੰ ਗ਼ਲਤ ਤੇ ਮੈਂ ਠੀਕ ।
- ਕਦੀ ਸਵਾਲ ਤੇ ਕਦੀ ਜਵਾਬ 
ਮੇਰੇ ਔਖੇ ਔਖੇ ਸਵਾਲ
ਤੇਰੇ ਸੌਖੇ ਸੌਖੇ ਜਵਾਬ
ਕਦੀ ਮਿਸ਼ਰੀ ਤੇ ਕਦੀ ਨਮਕੀਲੇ
ਕਦੀ ਮਿੱਠੇ ਤੇ ਕਦੀ ਜ਼ਹਿਰੀਲੇ
ਆਪਾਂ ਦਿਨਾਂ ਵਰਗੇ ਸੀ 
ਤੂੰ ਸ਼ੁਕਰਵਾਰ ਦੀ ਸ਼ਾਮ ਜਿਹੀ ਲੱਗਦੀ ਸੀ ।
-ਤੇ ਤੂੰ ਸੋਮਵਾਰ ਦੀ ਸਵੇਰ ਵਰਗਾ ।
ਫਿਰ ਆਪਾਂ ਹਫਤੇ ਹੋਣ ਲੱਗੇ 
ਹਫਤਿਆਂ ਤੋੰ ਮਹੀਨੇ ਬਣ ਗਏ ।
ਮਹੀਨਿਆਂ ਤੋਂ ਸਾਲ ਬਣ ਗਏ ।
ਬੱਸ ਹੁਣ ਰੁਕ ਜਾਈਏ ,
ਮੁੜ ਦੁਬਾਰਾ ਪਿਛਾਂਹ ਨੂੰ ਤੁਰ ਪਈਏ ।
ਜੇ ਹੋਰ ਗਹਾਂ ਲੰਘ ਗਏ ਤਾਂ ਸ਼ਾਮ ਢਲ ਜਾਏਗੀ ।
-ਵਿਛੜ ਵੀ ਟੁੱਟ ਵੀ ਗਏ
ਇੱਕ ਦੂਜੇ ਤੋਂ ?
-ਨਹੀਂ ਆਪਣੇ ਆਪ ਤੋਂ ।
ਜਿਵੇਂ ਅਸਮਾਨ ਚੋਂ ਸੂਰਜ ਰੁਸ ਜਾਵੇ ਤਾਂ 
ਇੰਨਾ ਚੰਨ ਤਾਰਿਆਂ ਨੂੰ ਕੌਣ ਪੁੱਛੇ ।
ਧੜਕਣ ਬਿਨਾਂ ਦਿਲ ਨੂੰ ਕੌਣ ਪੁੱਛੇ ।
ਇੱਕ ਦੂਜੇ ਤੋਂ ਟੁੱਟ ਕੇ
ਟੁੱਟ ਗਏ ਹਾਂ 
ਆਪਣੇ ਆਪ ਤੋੰ ।
ਆਪਾਂ ਹੁਣ ਬਦਲ ਗਏ ਹਾਂ 
ਹੁਣ ਪਹਿਲਾਂ ਜਿਹੇ ਨਹੀਂ ਰਹੇਂ ।

Sunday, 11 February 2018

ਰਾਜਾ ਰਾਣੀ ਤੇ ਫਿਸੱਡੀ

ਬਚਪਨ ਵੇਲੇ ਦੀ ਗੱਲ ਐ , ਜਦੋ ਵੀ ਅਸਮਾਨ ਚ ਤਾਰਿਆਂ ਨੇ ਦਸਤਕ ਦੇਣੀ । ਮੈਂ ਰੋਟੀ ਖ਼ਾ ਕੇ ਦਾਦੀ ਦੇ ਨਾਲ ਮੰਜਾ ਲ਼ਾ ਕੇ ਸੌ ਜਾਣਾ ਤੇ ਕਹਾਣੀਆਂ ਸੁਣਾਉਣ ਨੂੰ ਕਹਿਣਾ । ਦਾਦੀ ਨੇ ਰੋਜ ਇੱਕ ਹੀ ਕਹਾਣੀ ਸੁਣਾਉਣੀ ਤੇ ਮੈਂ ਰੋਜ ਓੰਨੇ ਹੀ ਚਾਅ ਨਾਲ ਸੁਣਨੀ । ਉਹ ਕਹਾਣੀ ਕਦੇ ਪੂਰੀ ਨਾ ਪੈਣੀ ਤੇ ਮੇਰੀ ਅੱਖ ਲੱਗ ਜਾਣੀ ।
ਕਿੰਨੀਆਂ ਹੀ ਰਾਤਾਂ ਲੰਘੀਆ ਪਰ ਓਹ ਕਹਾਣੀ ਪੂਰੀ ਨਾ ਹੋਈ , ਮੈਂ ਦਾਦੀ ਦੇ ਸਰਹਾਣੀ ਬੈਠੇ ਨੇ ਕਹਿਣਾ " ਅੱਜ ਉਹ ਕਾਨੀ ਪੂਲੀ ਸ਼ੁਣ ਕੇ ਹੀ ਸ਼ੋਊਗਾ ।
ਪਰ ਓਹ ਰਾਜਾ ਅਪਣੀ ਗੁੰਮ ਹੋਈ ਰਾਣੀ ਦੀ ਭਾਲ ਕਰਦਾ ਲੱਭਦਾ , ਮੈਂ ਅੱਖਾਂ ਮੀਚ ਸੋ ਗਿਆ ਹੋਣਾ । ਪੂਰੇ ਦਿਨ ਦੀ ਖੇਡ ਹੁੜਦੰਗ ਨੇ ਮੈਨੂੰ ਇੰਨਾ ਥੱਕਾ ਦਿੱਤਾ ਹੁੰਦੈਂ , ਦਾਦੀ ਦੇ ਮੱਥਾ ਥੱਪਦੇ ਥੱਪਦੇ ਮੈਂ ਸੋ ਗਿਆ ਹੋਣਾ । ਪਰ ਓਹ ਕਹਾਣੀ ਮੈਂ ਕਦੇ ਸੁਣ ਨਾ ਸਕਿਆ ।
ਕਿ ਰਾਜਾ ਤੇ ਰਾਣੀ ਦਾ ਕੀਂ ਹੋਇਆ ਨੂੰ ਕਦੇ ਪੂਰਾ ਨਾ ਕਰ ਸਕਿਆ । ਦਾਦੀ ਵੀ ਇੱਕ ਦਿਨ ਸਵੇਰੇ ਸਵਰਗਾਂ ਨੂੰ ਤੁਰ ਗਈ ।
ਮੈਂ ਵੱਡਾ ਹੋਇਆ ਤੇ ਇੱਕ ਫਿਸੱਡੀ ਖਿਡਾਰੀ ਬਣਿਆ , ਹਰ ਖੇਡ ਵਿੱਚ ਮੈਂ ਤੀਜੇ ਦਰਜ਼ੇ ਦਾ ਖਿਡਾਰੀ ਸੀ । ਸਕੂਲ ਦੀ ਫੁੱਟਬਾਲ ਟੀਮ , ਮੁਹੱਲੇ ਦੀ ਕ੍ਰਿਕੇਟ ਟੀਮ ਜਾਂ ਫਿਰ ਕੋਈ ਪੱਤੇ ਜਾਂ ਲੁੱਡੋ । ਮੇਰਾ ਹਾਰਨਾ ਹਰ ਥਾਂ ਤੈਅ ਹੁੰਦਾ । ਇੱਕ ਖੇਡ ਸੀ ਜਿਥੇ ਮੈਨੂੰ ਕੋਈ ਨਾ ਹਰਾ ਸਕਿਆ ਉਹ ਸੀ ' ਉਂਗਲ ' ਲੱਭਣ ਵਿੱਚ ।
ਮੈਂ ਆਪਣੀ ਚੀਚੀ ਨੂੰ ਏਦਾ ਲੁਕੋ ਲੈਂਦਾ ਕੇ ਮੁੱਠੀ ਵਿੱਚੋ ਕੋਈ ਉਸ ਉਂਗਲ ਨੂੰ ਲੱਭ ਲਵੇ ਇਹ ਕਦੇ ਨਹੀਂ ਹੋਇਆ ।
ਇਸ ਖੇਡ ਦੇ ਕਿਸੇ ਵੀ ਪਾਸੇ ਮੈਂ ਹੁੰਦੈਂ ਮੇਰੀ ਜਿੱਤ ਲਾਜ਼ਮੀ ਹੁੰਦੀ ।
ਤੂੰ ਇੱਕ ਕੁੜੀ ਸੀ ਤੈਨੂੰ ਵੀ ਆਹੀ ਲੱਗਦਾ ਸੀ ਤੂੰ ਹਰ ਖੇਡ ਹਾਰੇਗੀ । ਤੂੰ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਕਈ ਘੰਟੇ ਉਮੀਦ ਕਰਦੀ ਉਸ ਉਂਗਲ ਨੂੰ ਲੱਭ ਸਕੇ ।
ਕਈ ਸਾਲਾਂ ਬਾਅਦ ਤੇਰੇ ਬਾਪ ਦੀ ਬਦਲੀ ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਸ਼ਹਿਰ ਹੋ ਗਈ । ਤੂੰ ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਆਈ ਤੇ ਆਖਿਆ - ਸਾਰੇ ਜਾ ਰਹੇ ਹੈ , ਤੂੰ  ਮੈਨੂੰ ਕਿਤੇ ਲੁਕੋ ਕੇ ਆਪਣੇ ਕੋਲ ਸਾਂਭ ਲੈ । ਮੈਂ ਤੈਨੂੰ ਸਾਂਭਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਸੀ , ਕਾਹਲੀ ਦੇਣੇ ਮੈਂ ਤੈਨੂੰ ਮੰਜੇ ਹੇਠ ਲੁਕਾ ਦਿੱਤਾ , ਤੇਰਾ ਬਾਪ ਆਇਆ ਤੇ ਓਹਨੇ ਤੈਨੂੰ ਜਾਲੀਦਾਰ ਮੰਜੇ ਦੀ ਨਵਾਰ ਵਿੱਚੋ ਦੀ ਨੇ ਦੇਖ ਲਿਆ ਤੇ ਤੇਰਾ ਗੁੱਟ ਫੜ ਲੈ ਗਿਆ । ਅੱਖਾਂ ਮੂਹਰੇ ਤੈਨੂੰ ਜਾਂਦੀ ਨੂੰ ਦੇਖ ਰਿਹਾ ਸੀ ।
ਇਹ ਕਹਾਣੀ ਦਾਦੀ ਦੀ ਓਸ ਰਾਜੇ ਰਾਣੀ ਦੀ ਕਹਾਣੀ ਵਾੰਗੂ ਅੱਜ ਵੀ ਅਧੂਰੀ ਹੈ ਜਾਂ ਮੈਂ ਸੱਚਮੁੱਚ ਮੈਂ ਹਾਰ ਚੁੱਕਿਆ ਫਿਸੱਡੀ ਹਾਂ ???
ਮੈਂ ਤੈਨੂੰ ਵੀ ਕਿਉਂ ਨਾ ਅਪਣੇ ਹੱਥਾਂ ਦੀਆਂ ਉਂਗਲੀਆਂ ਵਿੱਚ ਲੁਕੋ ਸਕਿਆ ... ਕਾਸ਼ ਮੈਂ ਫਿਰ ਜਿੱਤ ਜਾਂਦਾ ।
ਕਾਸ਼ ਜੇ ਉਹ ਕਹਾਣੀ ਪੂਰੀ ਸੁਣੀ ਹੁੰਦੀ ।

Monday, 5 February 2018

दीवारें

मैं क्या लिख  रहा हूँ क्यों लिख रहा हूँ ।
जायज़ है भी है या फज़ूल ।
इसके बारे में न पहले सोचा और न ही अब सोचता हूँ ।
क्योंकि मैं सिर्फ हर बार तुम्हे सोचता हूँ ।
तुम कहोगी फज़ूल है ।
मगर मेरा इसमें कोई बस्स नही , तुम्हारे बारे में सोचते सोचते ज़िन्दगी निकल सी गई । कई बार दिल करता है जो बातें तुम्हारे बारे में सोचता हूँ वो तुम्हे कह सकता ।
पर प्यार साबित करना होता है ।
मुझे तुम्हारी आँखों से दूर जाना था इसका मतलब मैं पहले जान गया था । आंखों से दूर मतलब दिल से दूर ।
क्योंकि प्यार सिर्फ मैंने किया था ।
जिसका मुझे भी एहसास नही कितना ।।
क्या मैं तुम्हे पा सकूँगा ।
शायद नही ......
क्या ज़िन्दगी ऐसे ही निकल जाएगी ।
मगर मैं फिर से कोशिश करता हूँ ।
एक कोशिश आज तक सिर्फ तुम्हें पाने की करता रहा ।
अब एक कोशिश ये करूँगा ।
तुम्हे भुला सकूं ।
वैसी हर शै को खत्म कर दूंगा , जिसमे तुम शामिल हो । 
क्या काफी होगा तुम्हे भुलाने के लिए ।
तुम्हे पाने की जो कोशिशें थी वो नाकाम रही । अब तुम्हे पूरी ज़िंदगी लगेगी भुलाने में ।
इसे बेबसी का नाम दूँ 
या बेचैनी कह के सहता रहूँगा ।
मैं बेपरवाह होना चाहता था मगर फिर भी परवाह है ।
लौटने को जी चाहता है ।
तुम्हें देखता हूँ तो पीछे सिर्फ एक दीवार है ।
इस दीवार को तोड़ने को जी चाहता है ।
मगर ये दीवार तुम्हारे घर की है ।
करे क्या कि दिल भी तो मजबूर है ,
जमीन सख्त है और आसमां दूर है ।

शिताब

मैं आज कल जिस दुनिया में रहता हूँ वह दिन बहुत् बहुत छोटे छोटे है और रातें इतनी लंबी है कि - कैसे बयान करूँ !!!
बस बड़ी मुश्किलात से कट जाती है ।
दिन की भीड़ किसी न किसी तरह वक़्त और मन दोनो बहला देती है ।
मगर रातें सुनसान और गमगीन लगती है , जहां दिन में कुछ छूट जाता है वही से वो ख्याल और वो बातें आकर जकड़ लेती है ।
मेरे पास अब एक घर है ।
घर किराये का है जिसका किराया मैं नही देता हूँ ।
मगर यहाँ इस घर को चलाने की जिम्मेदारी मेरी है । बस समझ लो कि दिन कुछ इसकी जरूरतों को जुटाने में ही गुज़र जाता है ।
जो सपने तुम्हारे लिए देखे थे , उनका हक कोई और माँगता है । पर उसे ये हक़ जमाने का कोई हक दे नही रखा है । बस ये परेशानी है ।
ये परेशानी ऐसी है कि जैसे तुम्हारी चीज़ मेरे पास हो और मैं उसे संभाले बैठा हूँ । इस सब की असल हक़दार तुम हो , तुम थी और तुम ही हक़दार रहोगी ।
ये ख़्याल ये दिन ये रातें .... तुम्हारे ही लिए सजाई थी ।
इस घर को भी तुम्हारे लिए ही सोचा था ।
जो सोचा था
सब कुछ वैसे का वैसे ही है
बस तुम्हारी कमी है ।
सब कुछ है
मगर तुम्हारे न होने से सब कुछ खाली खाली से लगता है ।
तुम जब भी आना तो वहुत सारा वक़्त ले के आना क्योंकि इस खालीपन को निकाल फेंकने के लिए कुछ लंम्हे लगेंगे  । तुम्हे देर नही करनी चाहिए ।
भूल जाओ और एक नए से होकर फिर से शुरुआत करते है और इस खालीपन को फिर से भरते है ।

Tuesday, 30 January 2018

ਪ੍ਰਧਾਨ

ਹਾਂ ਬੱਲੀ
 ਹਣੀ ਬਿਨਾ ਚੂਚਾ ਨਹੀਂ 
ਮੁੰਨਾ ਬਿਨਾ ਸਰਕਟ ਨਹੀਂ 
ਬਸ ਓਵੇਈਂ ਨੇੜੇ ਤੇੜੇ ਜੇ ਬੱਲੀ ਤੇ ਮੈਂ ....
ਬੱਲੀ ਤੇਰਾ ਅੱਜ ਜਨਮ ਦਿਨ ਹੈ .....
ਬੱਲੀ ਨੂੰ ਪਹਿਲੀ ਵਾਰੀ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਵਿਚ ਕੰਟੀਨ ਚ ਮਿਲਿਆ .. ਪ੍ਰਧਾਨ ਨੇ ਪੜਾਈ ਆਲੇ ਮੋਟੇ ਮੋਟੇ ਖੋਪੇ ਲੈ ਰੱਖੇ | ਮੈਂ ਸੋਚਿਆ ਪ੍ਰਧਾਨ ਕੀਤੇ ਪੜਾਈ ਚ ਅਵੱਲ ਦਰਜੇ ਦਾ ਖਿਡਾਰੀ ਹੋਣਾ .. ਪਰ ਨਹੀਂ ਪ੍ਰਧਾਨ ਪੂਰਾ ਚਵੱਲ ਨਿਕਲਿਆ | ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਵੀ ਦੁਗਣਾ ਨਲੈਕ .. ਕਿਤਾਬੀ ਪੜਾਈ ਚੋ ਬਸ 
ਬਾਕੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਤੇ ਸਾਰੇ ਤੱਤ ਕੱਢ ਰੱਖੇ ਸੀ  | ਅਸੀਂ ਕਦੀ ਕੋਈ ਇੱਕੋ ਕਲਾਸ ਚ ਨਹੀਂ ਮਿਲੇ ਬਸ ਰਾਹ ਜਾਂਦੇ ਮਿਲ ਪਏ | 
ਸਿਆਣੀ ਗੱਲ ਦੀ ਉਮੀਦ ਬੱਲੀ ਤੋਂ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ ਜਾ ਸਕਦੀ | ਪਰ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਬਿਨਾ ਗੈਲਨ ਮਾੜਾ ਵੀ ਨਹੀਂ ਬੋਲਿਆ |
ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਕੋਠੇ ਤੋਂ ਥੱਲੇ ਸੁੱਟ ਕੇ ਮਾਰਨ ਦੀ ਧਮਕੀ ਵੀ ਨਹੀਂ ਦਿਤੀ |
ਕਿਸੇ ਦੀ ਸਹੇਲੀ , ਕਿਸੇ ਦੀ ਜਨਾਨੀ ਪਿੱਛੇ ਵੀ ਪ੍ਰਧਾਨ ਕਦੀ ਨਹੀਂ ਲੜਿਆ |
ਮਤਲਬ ਕਦੀ ਐਦਾ ਵੀ ਨਹੀਂ ਹੋਇਆ ਕਿ ਬੱਲੀ ਤੇ ਮੈਂ ਇਕੱਠੇ ਖੜੇ ਹੋਇਏ ਤੇ ਕੋਈ ਪੰਗਾ ਨਾ ਪਿਆ ਹੋਵੇ |
ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਵਿਚ ੨ ਸਾਲ ਪ੍ਰਧਾਨ ਨਾਲ ਨਿਕਲੇ |
ਬੱਲੀ ਨੇ ਕਦੀ ਕੋਈ ਸਿਆਣੀ ਗੱਲ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ ਫੁੱਦੂ ਤੋਂ ਫੁੱਦੂ ਗੱਲ ਦੀ ਪ੍ਰਧਾਨ ਤੋਂ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹੋ |
ਮਤਲਬ ਜੇ ਓਹਨੇ ਕਹਿਤਾ ਨਾ " ਪ੍ਰਧਾਨ ਬਾਥਰੂਮ ਚ ਭੂਤ ਹੈਗਾ ਤਾਂ ਹੈਗਾ |
ਦਿਨੇ ਸਾਲੇ ਨੂੰ ਕਹਿ ਦੋ ਬਾਈ ਪੰਗਾ ਪੈ ਗਿਆ - ਇਹਨੇ ਕਹਿਣਾ ਹੁਣੇ ਆਇਆ |
ਪਰ ਸਾਲੇ ਨੇ ਜਦੋ ਪਿਸ਼ਾਬ ਕਰਨ ਜਾਣਾ ਹੁੰਦਾ ਤਾ ਮੇਨੂ ਆ ਕੇ ਠਾਉਂਦਾ ਪ੍ਰਧਾਨ ਨਾਲ ਚੱਲ ...
ਮੈਂ ਕਹਿਣਾ ਕਿਉਂ - "ਮੈਂ ਫੜ ਕੇ ਥੋੜੀ ਕਰਾਉਣਾ ...
ਇਹਨੇ ਕਹਿਣਾ ਨਹੀਂ ਪ੍ਰਧਾਨ - ਮੈਂ ਸੁਣਿਆ ਬਾਥਰੂਮ ਚ ਭੂਤ ਹੈ |
ਅੰਬਰਸਰ ਕਦੇ ਵੀ ਘੈਂਟ ਨਾ ਹੁੰਦਾ ਜੇ ਬੱਲੀ ਨਾ ਹੁੰਦਾ ..
ਬੱਲੀ ਤੋਂ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਸਿਖਿਆ ਬਿਨਾ ਯਾਰੀ ਦੇ .
ਬਾਕੀ ਤੇਰੇ ਨਾਲ ਹੁੰਦਿਆਂ ਪਏ ਤਾਂ ਘਾਟੇ ਹੀ ਹੈ .. ਪਰ ਪ੍ਰਧਾਨ ਕਦੇ ਮਹਿਸੂਸ ਨਹੀਂ ਹੋਏ |
ਬਾਕੀ ਮੇਰੇ ਵੱਲ ਤੇਰੇ ਬਹੁਤ ਉਧਾਰ ਹੈ ...
ਜਿਹੜੇ ਮੈਂ ਕਦੀ ਨਹੀਂ ਦੇਣੇ |
ਪਰ ਬਾਬੇ ਤੇਰੇ ਪੰਪ ਚ ਆ ਕੇ ਮੈਂ ਬਹੁਤ ਵੱਡਾ ਨੁਕਸਾਨ ਕੀਤਾ ... ਬਸ ਇਸ ਕਰਕੇ ਵੀ ਤੂੰ ਯਾਦ ਰਹੇਗਾ |
ਹਾਸੇ ਵਕ਼ਤ ਦੇ ਵਕ਼ਤ ਤੇ ਹੁੰਦੇ ਐ , 
ਕਰ ਕਰਾ ਕੇ ਮੇਰੇ ਪੱਲੇ  ਤਾਂ ਕੋਈ ਡਿਗਰੀ  ਵੀ ਨਹੀਂ ਆਈ  |
ਬਸ ਹੋਂਸਲੇ ਕਾਇਮ ਹੈ ....
ਲਿਖਣ ਨੂੰ ਬਹੁਤ ਚਾਹੁਣਾ ਬਸ ਆਵਦਾ ਝੱਗਾ ਚੱਕਿਆ ਢਿੱਡ ਆਵਦਾ ਨੰਗਾ ਥਿਆਉਣਾ ....
ਐਬ ਮੇਰੇ ਚ ਵੀ ਹੈ ... ਕੋਈ ਨਾ ਦਿੱਲੀ ਆ ਕੇ ਘੱਟ ਕਰ ਲੈਣੇ ਆ | ਬਾਕੀ ਲੋਕ ਨੂੰ ਤੇਰੇ ਤੇ ਮਾਣ ਹੁੰਦਾ ਹੋਊ .
ਆਪਾ ਨੂੰ ਹੰਕਾਰ ਹੈ ਤੇਰੇ ਤੇ | ਬਾਕੀ ਕੋਈ ਨਾ ਸਭ ਕੈਮ ਰੱਖ |
ਖੈਰ ਤੇਰਾ ਜਨਮ ਦਿਨ ਹੈ ਅੱਜ ਇਹਦੀਆਂ ਬਹੁਤ ਬਹੁਤ ਮੁਬਾਰਕਾਂ | 
ਚੇਤੇ ਕਰਾਉਣ ਲਈ ਤੇਰਾ ਸ਼ੁਕਰੀਆ |
ਜਨਮਦਿਨ ਤੇ ਬੁੱਲੇ ਲੁੱਟ ਮੰਸੂਰੀ ਮਸਾਰੀ ਜਾ ,
ਹੋਟਲ ਬੁੱਕ ਕਰਾ |
ਸਾਡੇ ਆਲੀ ਪਾਰਟੀ ਯਾਦ ਰੱਖੀ ਬਸ  |

Tuesday, 19 December 2017

ਤੋਹਫ਼ਾ

ਅੱਜ ਮੇਰਾ ਜਨਮ ਦਿਨ ਹੈ | 
ਆਦਤ ਅਨੁਸਾਰ ਅੱਜ ਵੀ ਮੈਨੂੰ ਕਿਸੀ ਘੜੀ ਦੇ ਅਲਾਰਮ ਨੇ ਨਹੀਂ ਜਗਾਇਆ |
ਕੋਈ  ਅਵਾਜ ਮੇਰੇ ਕੰਨੀ ਨਹੀਂ ਪਈ ਤੇ ਜੋ ਮੈਂ ਉੱਠ ਖੜੌਂਦਾ |
ਗਰਮੀ ਦਾ ਦਿਨ ਹੈ | ਮੇਰਾ ੮ਬਾਈ ੮ ਦੇ ਕਮਰੇ ਵਿਚ ਇਕ ਮੇਜ ਇਕ ਕੁਰਸੀ ਇਕ ਮੰਜਾ ਇਕ ਅਲਮਾਰੀ ਤੇ ਬਾਕੀ ਕੁਝ ਕਿਤਾਬਾਂ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਕੁਝ ਤਸਵੀਰਾਂ ਨੇ ਜੋ ਦੀਵਾਰ ਦੀ ਸਿੱਲਣ ਨੂੰ ਲੁੱਕੋ ਕੇ ਰੱਖਦੀਆਂ | ਕੱਲ ਰਾਤ ਨੂੰ ਇਕ ਆਵਾਜ਼ ,ਇਕ ਫੋਨ ਦੀ ਘੰਟੀ,  .... ਨੂੰ ਉਡੀਕਦਿਆਂ ਰਾਤ ਪਤਾ ਨਹੀਂ ਕਿਥੇ ਨਿਕਲ ਗਈ ਤੇ ਸੂਰਜ ਦੀ ਦਸਤਕ ਦੇ ਆਉਣ ਦੇ  ਨਾਲ ਅੱਖਾਂ ਬੰਦ ਕੀਤੀਆਂ ਤੇ ਸੁਪਨਿਆਂ ਵਿਚ ਉਸ ਆਵਾਜ਼ ਨੂੰ ਭਾਲਣ ਲਈ ਤੁਰ ਪਿਆ |
ਮੰਜੇ ਤੇ ਸੁੱਤੇ ਪਿਆ ਦਿਨ ਬੀਤ ਗਿਆ ਤੇ ਦੁਪਹਿਰ ਦਾ ਪਹਿਰ ਮੇਰੇ ਕਮਰੇ ਦੇ ਬਾਹਰ ਖਲੋਤਾ ਹੈ |
ਦੁਪਹਿਰ ਵੇਲਾ ਆ ਗਿਆ |
ਅੱਖ ਖੁੱਲੀ ....
ਕੁਝ ਦੇਰ ਸਾਹਮਣੇ ਦੀ ਕੰਧ ਤੇ ਲੱਗੀ ਉਸ ਤਸਵੀਰ ਨੂੰ ਦੇਖਦਾ ਰਿਹਾ |
ਕੈਲੰਡਰ ਵੱਲ ਵੇਖਿਆ .. ਲੱਗਿਆ  ਜਿਵੇਂ ਮੇਰਾ ਮਖੌਲ ਬਣਾਉਂਦਾ ਉੱਚੀ ਉੱਚੀ ਕੋਈ  ਹੱਸ ਰਿਹਾ ਹੋਵੇ |
ਘੜੀ ਵਾਲ ਵੇਖਿਆ ਤੇ ਵਕ਼ਤ ਸੀ ੧੧:੪੫ ਦਾ , ਮਨ ਹੋਰ ਚਿੜਚਿੜਾ ਹੋ ਗਿਆ |
ਦਿਲ ਨੂੰ ਕਾਹਲ ਜਿਆ ਪੈਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਇਆ |
ਫੋਨ ਲੱਭਿਆ ਤੇ ਦੇਖਿਆ ... ਸਕਰੀਨ ਜਵਾਂ  ਕਾਲੀ ਸ਼ਾ ਸੀ ..
ਬੈਟਰੀ ਨਾ ਹੋਣ ਕਰਕੇ ਫੋਨ ਵੀ ਆਪਣਾ ਦਮ ਤੋੜ ਚੁੱਕਿਆ ਸੀ ... 
ਉਤਾਵਲਾਪ੍ਨ ਹੋਰ ਵੱਧ ਗਿਆ |
ਬੂਹਾ ਖੋਲਿਆ ਤੇ ਮੇਰਾ ੮ ਬਾਈ ੮ ਦਾ ਕਮਰੇ ਵਿਚ ਅੱਗ ਵਾਂਗ ਬਲਦੇ ਸੂਰਜ ਤੇ ਬਾਹਰਲੀ ਦੁਨੀਆ ਦਾ ਰੌਲਾ ਰੱਪਾ ਸਭ ਆ ਵੜੇ | ..
ਮੰਜੇ ਉੱਤੇ ਖਾਲੀ ਮਨ ਨਾਲ ਕਿੰਨੀ ਦੇਰ ਤਕ ਬੈਠਾ ਰਿਹਾ ..
ਕੋਈ ਵਾਰ ਖਾਲੀ ਖਿਆਲ ਵੀ ਕਿੰਨੀ ਦੇਰ ਤੱਕ ਮੈਨੂੰ ਆਪਣੇ ਨਾਲ ਰੋਕ ਬਿਠਾਉਂਦੇ ਨੇ ..
ਮਨ ਅੰਦਰ ਹਿੰਮਤ ਕੋਈ ਜਵਾਬ ਨਹੀਂ ਦੇ ਰਹੀ ਸੀ ਸੋਚ ਰਿਹਾ ਸੀ .. ਸ਼ਾਇਦ ਕੋਈ ਹਿੰਮਤ ਆਵੇ ਤੇ ਬਾਹਰ ਲੋਕ ਦੇ ਵਿਚ ਜਾ ਪਸਰਾ |
ਘੜੀ ਨੇ ੧੨:੪੫ ਦਾ ਇਸ਼ਾਰਾ ਕੀਤਾ , 
ਆਪਣੇ ਨਾਲ ਜਦੋ ਜਹਿਦ ਤੇ ਆਲਸ ਨਾਲ ਲੜਦਿਆਂ ਨੂੰ ਘੜੀ ਨੇ ਆਪਣਾ ੧ ਘੰਟੇ ਦਾ ਗੇੜਾ ਕੱਢ ਲਿਆ ਸੀ ਤੇ ਮੈਂ  ਹਾਲੇ ਕਮਰੇ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਨਿਕਲ ਕੇ ਅੰਦਰੋਂ ਮਰੇ ਮੰਨ ਨੂੰ ਧਾਹਾਂ ਮਾਰ ਕੇ ਜਗਾਉਣ ਦੇ ਯਤਨੀ ਪਿਆ ਸੀ |
ਅੰਦਰੋਂ ਜਦੋ ਕੋਈ ਆਵਾਜ਼ ਨਾ ਆਈ ਤੇ ਸੋਚਿਆ ਸ਼ਾਇਦ ਕੋਈ ਫੋਨ ਨਾ ਆ ਜਾਵੇ |
ਫੋਨ ਨੂੰ ਚਲਾਉਣ ਲਾਇ ਚਾਰਜਰ ਲੱਭਣ ਲੱਗਾ ਸੀ ਤੇ ਵੇਖਿਆ ਤੇ ਚੇਤਾ ਆਇਆ ਉਹ ਤੇ ਮੈਂ ਰਾਤੀ ਕੰਧ ਤੇ ਮਾਰ ਕੇ  ਤੋੜ ਦਿੱਤਾ | ਜੇਬ ਵਿਚ ਵੇਖਿਆ ਤੇ ਸਿਰਫ ੧੬ ਰੁਪਏ ਸੀ |
ਭੁੱਖ ਵੀ ਲੱਗ ਰਹੀ ਸੀ ਆਖਰੀ ਵਾਰ ਪਿਛਲੀ ਦੁਪਹਿਰ ਨੂੰ ਹੀ ਰੋਟੀ ਛਿੱਥ ਕੇ ਵੇਖੀ ਸੀ |
ਬਾਹਰ ਨਿਕਲਿਆ ਤੇ ਨਾਲ ਦੇ ਘਰ ਵਿੱਚੋ ਸਾਹਿਲ ਜੀ ਦਾ ਦਰਵਾਜਾ ਖੜਕਾਇਆ ਤੇ ਚਾਰਜਰ ਮੰਗਿਆ ਫੋਨ ਨੂੰ ਲਾ ਕੇ ਗੁਸਲਖਾਨੇ ਚਲਿਆ ਗਿਆ ..
ਆਪਣੇ ਆਪ ਵਿੱਚੋ ਜਾਨ  ਨਿੱਕਲੀ ਜਾਪਦੀ ਸੀ |
ਹੌਲੀ ਹੌਲੀ ਲਗਿਆ ਜਿਵੇਂ ਮੇਰੇ ਦਿਮਾਗ ਵਿਚ ਖਿਆਲ ਆਉਣੇ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋ ਚਲੇ  ਨੇ 
ਦਿਮਾਗ ਨੇ ਸੋਚਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤਾ, 
ਅੱਜ ਮੇਰਾ ਜਨਮਦਿਨ ਹੈ | ਮਹਿਸੂਸ ਕੀਤਾ ਕਿ ਹਾਲੇ ਵੀ ਸੁਪਨੇ ਵਿਚ ਹੀ ਹਾਂ ਜਾ ਫਿਰ ਸੱਚੀ ਉੱਠ ਖੜੋ ਕੇ ਇਥੇ ਸ਼ੀਸ਼ੇ ਸਾਹਮਣੇ ਆ ਖਲੋਤਿਆਂ ਹਾਂ |
ਮੈਨੂੰ ਆਪਣੇ ਅੱਜ ਦੇ ਦਿਨ ਤੋਂ ਕੋਈ ਚਾਅ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ , ਬਸ ਕਮੀ ਸੀ ਕਿ ਮੈਂ ਓਹਦੇ ਤੋਂ ਅੱਜ ਦੂਰ ਹਾਂ |
ਸ਼ਾਇਦ ਇੰਨੀ ਦੂਰ ਜਿਥੋਂ ਮੁੜ ਕੇ ਉਸ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚਣ ਦੀ ਕੋਈ ਆਸ ਨਹੀਂ |

ਸ਼ਾਇਦ ਅੱਜ ਉਹ ਮੇਨੂ ਫੋਨ ਕਰੇ  ਤੇ ਓਹਦੀ ਆਵਾਜ਼ ਸੁਣ ਕੇ ਮੈਨੂੰ ਜਿਓੰਦੇ ਰਹਿਣ ਲਈ ਇਕ ਸਾਲ ਉਧਾਰਾ ਮਿਲ ਜਾਏਗਾ |
ਲਗਦਾ ਸਰੀਰ ਅੰਦਰੋਂ ਕੋਈ ਲੱਥ ਗਿਆ ਜੇ ਇਕ ਉਹ ਆਵਾਜ਼ ਫੇਰ ਕੰਨਾਂ ਵਿਚ ਆ ਵੱਜੇ ਤਾਂ  ਓਹਨੂੰ ਫੇਰ ਆਪਣੀ ਥਾਂ ਤੇ ਜਾ ਕੇ ਬੈਠਣ ਲਈ  ਕੋਈ ਜਗ੍ਹਾ ਮਿਲ ਜਾਏਗੀ |
ਸਬ ਠੀਕ ਹੋ ਜਾਏਗਾ ਜੇ ਓਹਦੀ ਆਵਾਜ਼ ਮੇਰੇ ਕੰਨਾਂ ਦੇ ਵਿਚ ਲੰਘ ਜਾਵੇ ਤੇ ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਚੇਤਿਆ ਵਿਚ ਓਹਦੇ ਹਰ ਲਫ਼ਜ਼ ਨੂੰ ਸੰਭਾਲ ਲਵਾਂ | ਪਾਰ ਹਾਲੇ ਤਕ ਇਹੋ ਜੀਅ ਕੁਝ  ਵੀ ਨਹੀਂ ਘਟਿਆ ਸੀ |
ਸ਼ਾਇਦ  ਵਕ਼ਤ ਫੇਰ ਓਵੇਈਂ  ਪਹਿਲਾ ਵਾਂਗ  ਦੌੜਨਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰੇਗਾ ਤੇ ਉਹ ਮੁੜ ਆ ਕੇ ਮੇਨੂ ਆਖੇਗੀ " ਸੁਣ "

ਖ਼ਿਆਲ ਚੋ ਉਖੜ ਕੇ ਬਾਹਰ ਡਿੱਗਿਆ ਤਾਂ ਸਾਹਮਣੇ ਵਾਸ਼ਬੇਸਿਨ ਪਾਣੀ ਨਾਲ ਭਰ ਚੁੱਕਿਆ ਸੀ ..
ਆਪਣੀ ਸ਼ਕਲ ਨੂੰ ਵੇਖਿਆ ਵੇਖਦਿਆਂ ਵਕ਼ਤ ਦਾ ਇਕ ਹੋਰ ਘੰਟਾ ਬੀਤ  ਚੁਕਾ ਸੀ |
ਆਪਣੀ ਹੀ  ਸ਼ਕਲ ਮੇਨੂ ਡਰਾਉਣੀ ਲੱਗ ਰਹੀ ਸੀ 
ਇਹ ਕੌਣ ਹੈ ...
ਅੱਖਾਂ ਮੈਂਨੂੰ ਡੂੰਘੇ ਖੂਹ ਵਾਂਗ  ਲੱਗ ਰਹੀਆਂ ਸੀ |
ਅੱਜ ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਪੂਰੀ ਦੁਨੀਆ ਵੀ ਹੋਵੇ ਮੇਰੇ ਲਈ  ਮਿੱਟੀ ਹੈ ਮੇਨੂ ਸਿਰਫ ਓਹਦਾ ਚੇਹਰਾ ਭਾਲਣਾ ਸੀ , ਓਹਦਾ  ਇਕ ਬੋਲ ਵੀ ਮੇਨੂ ਜਿਓੰਦਾ ਕਰ ਸਕਦਾ ਸੀ |
ਕਮਰੇ ਵਿਚ ਵਾਪਸ ਆਇਆ ਤੇ ਫੋਨ ਨੂੰ ਦੁਬਾਰਾ ਆਨ ਕੀਤਾ  ਤੇ ਦੇਖਿਆ ਕੋਈ ਸੁਨੇਹਾ ਨਹੀਂ ਆਇਆ ਸੀ ..
ਪਤਾ ਨਹੀਂ ਕਿੰਨੇ ਹੋਰ ਸੁਨੇਹੇ ਮੈਨੂੰ  ਲੰਬੀ ਉਮਰ ਦੇ ਮੇਹਣੇ ਮਾਰ ਰਹੇ ਸੀ ਪਰ ਜਿਹੜੇ ਲਈ  ਮੈਂ ਦੁਵਾਵਾਂ ਕਰਦਾ ਰਿਹਾ ਉਹ ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਤੱਕ ਨਹੀਂ ਸੀ |
ਮਨ ਅੰਦਰੋਂ ਹੋਰ ਹਲੂਣ ਗਿਆ 
ਜਿਵੇਂ ਮੇਰੇ ਅੰਦਰੋਂ ਕਿਸੇ ਨੇ ਮੇਰੇ ਲਹੂ ਦੀ ਰਫਤਾਰ ਤੇ ਬੰਨ ਲਾ ਦਿੱਤੋ ਹੋਵੇ |
ਘੜੀ ਵਾਲ ਤੱਕਿਆ ਤੇ ੨ ਵੱਜ ਚੁੱਕੇ ਸੀ .
ਬਸ ਹੁਣ ਇਹ ਉਮੀਦ ਸੀ ਕਿ ਕਿਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਇਹ ਇੱਕ ਤਰੀਕ ਮੇਰੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਵਿੱਚੋ ਨਿਕਲ ਜਾਵੇ |
ਮੰਜੇ ਨੂੰ ਫਿਰ ਜਾ ਮੱਲਿਆ |

ਸੁਪਨਿਆਂ ਦੀ ਦੁਨੀਆ ਆਪਣੇ ਵੱਲ ਆਵਾਜ਼ ਮਾਰ ਰਹੀ ਸੀ 
ਹਿੰਮਤ ਜਿਹੀ ਕਰਕੇ ਕਿਤਾਬ ਚੱਕੀ ਤੇ ਇਸ ਜੇਲਨੁਮਾ ਕੈਦ ਚੋ ਬਾਹਰ ਨਿਕਲ ਕੇ ਲਾਇਬ੍ਰੇਰੀ ਵੱਲ ਵਧਿਆ ...
ਜਿਵੇਂ ਜਿਵੇਂ ਪੈਰ ਬਾਹਰ ਪੁੱਟ ਰਿਹਾ ਸੀ ਸੂਰਜ ਵੀ ਆਪਣੀ ਅੱਗ ਦੇ ਸੇਕ ਨੂੰ ਘਟਾਉਂਦਾ ਰਿਹਾ ..
ਅਸਮਾਨ ਮੇਨੂ ਬਾਹਰ ਵੇਖ ਮੇਰੇ ਤੇ ਤਰਸ ਕਰ ਜਿਵੇਂ ਅੱਗ ਨੂੰ ਬੁਝਾਉਣ ਲਾਇ ਗਰਜ਼ ਰਿਹਾ ਸੀ |
ਬਜ਼ਾਰ ਦੀ ਸਾਰੀ ਭੀੜ ਚਹਿਕ ਮਹਿਕ ਮੇਨੂ ਰੌਲਾ ਲੱਗ ਰਹੀ ਸੀ |
ਜਾ ਕੇ ਇਕ ਥਾਂ ਨੂੰ  ਮੱਲਿਆ ਤੇ ਲਿਖਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤਾ ..
ਅੱਜ ਬੱਦਲ ਨੂੰ ਕੋਈ ਸੂਲ ਹੋ ਰਿਹਾ 
ਪਾਣੀ ਤੇ ਅੱਗ ਵੀ ਸੰਗ ਸੰਗ ਜਾਪਦੇ ਨੇ 
ਨਾ ਕੋਈ ਬੂਹਾ ਹੈ ਨਾ ਕੋਈ ਬਾਰੀ ਹੈ ਨਾ ਕੋਈ ਰਸਤਾ ਹੈ ਨਾ ਕੋਈ ਪੌੜੀ ਹੈ 
ਸਿਰਫ ਇਕ ਪੰਗਡੰਡੀ ਹੈ ਜੋ ਫੁੱਲਾਂ ਨੇ ਬਣਾਈ ਹੈ 
ਜੋ ਪੈਰਾਂ ਲਈ ਬਹੁਤ ਥੋੜੀ ਹੈ 
ਰੋਸ਼ਨੀ  ਗੁਮਸ਼ੁਦਾ ਹੈ |

ਲੋਕ ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਆਉਂਦੇ ਤੇ ਮੁਬਾਰਕਬਾਦ ਦਿੰਦੇ ...
ਮੇਰੀਆਂ ਅੱਖਾਂ ਵਿਚ ਇਕ ਤਸਵੀਰ ਛਪੀ ਹੋਈ ਵੇਖ ਕੇ ਉਹ ਮੇਨੂ ਕੋਈ ਡਾਕਟਰ ਦੀ ਸਲਾਹ ਦਿੰਦੇ |
ਇਕ ਫੋਨ ਵੱਜਿਆ |
ਨੰਬਰ ਅਣਜਾਣ ਸੀ |
ਹੈਲੋ ਕਹਿਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ .. ਅੱਗੇਓ ਕੋਈ ਬੋਲਿਆ "ਤੁਹਾਡਾ ਕੋਈ ਪਾਰਸਲ ਆਇਆ ... ਸ਼ਾਮ ੬ ਵਜੇ ਤੁਹਾਨੂੰ ਫੜਾਉਣ ਲਈ ਆਇਆ ਜਾਏਗਾ ... ਕਿ ਤੁਸੀਂ ਉਸ ਸਮੇ ਉਪਲਭਧ ਹੋਵੋਂਗੇ | ਮੇਨੂ ਜਿਵੇਂ ਕਿਸੇ ਆਸ ਨੇ ਫਿਰ ਜਿਓੰਦਾ ਕਰ ਦਿੱਤੋ ਹੋਵੇ |
ਤੁਸੀਂ ਆ ਜਾਣਾ ਮੇਰੇ ਮੂਹੋ ਇੰਨਾ ਹੀ ਨਿਕਲ ਸਕਿਆ |
ਕੋਈ ਆ ਰਿਹਾ ਸੀ .. ਸ਼ਾਇਦ ਮੇਰਾ ਤੋਹਫ਼ਾ |
ਸ਼ਾਇਦ ਓਹਨੂੰ ਯਾਦ ਹੋਵੇ |
ਜਾਂ ਸ਼ਾਇਦ ਕੁਝ ਵੀ ...
ਪਰ ਲੱਗ ਰਿਹਾ ਸੀ ਜਿਵੇਂ ਮੇਰੇ ਪੈਰਾਂ ਨੂੰ ਪਰ ਲੱਗ ਰਹੇ ਸੀ |
ਘੜੀ ਤੇ ੩:੩੦ ਵੱਜ ਚੁਕੇ ਸੀ |
ਮੇਨੂ ਜੋ ਵੀ ਕੋਈ ਹੁਣ ਮੁਬਾਰਕ ਕਹਿਣ ਆਉਂਦਾ ਮਈ ਉਸਨੂੰ ਹੱਸ ਕੇ ਮਿਲਦਾ,   ... ਭੁੱਖ ਵੀ ਲੱਗ ਰਹੀ ਸੀ |
ਜੇਬ ਚੋ ੧੬ ਰੁਪਏ ਕੱਢੇ ਤੇ ਕੈਫੇ ਜਾ ਜੇ ਇਕ ਚਾਹ ਤੇ ਸਮੋਸਾ ਖਾਧਾ |
ਖਿਆਲ ਆਇਆ ਸ਼ਾਇਦ ਕੀਤੇ ਤੋਹਫ਼ਾ ਦੇਣ ਵਾਲੇ ਦੇ ਨਾਲ ਉਹ ਆਪ ਨਾ ਆ ਜਾਵੇ ... ਜੇ ਉਹ ਆਏਏਗੀ ਤਾਂ ਓਹਨੂੰ ਖਾਤਿਰਦਾਰੀ ਵਿਚ ਕੀ ਖਵਾਵਾਂ ਪਿਆਵਾਂ ..
ਕੈਫੇ ਵਾਲੇ ਨਾਲ ਉਧਾਰੀ ਦੀ ਗੱਲ ਕਰ ਲਈ  ਜੇ ਕੋਈ ਮਹਿਮਾਨ ਆਏਗਾ ਤਾਂ ਓਹਨੂੰ ਕੈਫੇ ਦਾ ਸਬ ਤੋਂ ਸਵਾਦ ਤੇ ਲਜ਼ੀਜ਼ ਖਾਣਾ ਆਉਣ ਵਾਲੇ ਮਹਿਮਾਨ ਨੂੰ  ਪਰੋਸ ਦੇਣਾ |
ਕੈਫੇ ਵੱਲ ੨-੩ ਨਾ ਨੁੱਕਰ ਕਰਨੇ ਮਗਰੋਂ  ਮੰਨ ਗਿਆ |



੫:੪੫ ਹੋ ਚੁਕੇ ਸੀ ਮਈ ਕਮਰੇ ਵਿਚ ਵਾਪਸ ਆਇਆ ਤੇ ਆਪਣੀ ਹਾਲਤ ਸੁਧਾਰੀ ਤੇ ਬੜੇ ਦਿਨਾਂ ਮਗਰੋਂ ਕੋਈ ਨਵਾਂ ਲੀੜਾ ਪਾਇਆ |
ਭੱਜਦਿਆਂ ਭੱਜਦਿਆਂ ਬਾਹਰ ਜਾ ਤੁੱਰ ਪਿਆ ..
ਕੋਈ ਪੁੱਛਦਾ ਤਾਂ ਆਖਦਾ ਕੋਈ ਮੇਰਾ ਤੋਹਫੇ ਨਾਲ ਬਾਹਰ ਇੰਤਜ਼ਾਰ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹੈ  |
ਬਾਹਰ ਪਹੁੰਚਿਆ ਤੇ ਕੋਈ ਵੱਡੇ ਬੈਗ ਨਾਲ ਓਥੇ ਉਡੀਕ ਰਿਹਾ ਸੀ |
ਸ਼ਾਇਦ ਕੋਈ ਪਾਰਸਲ ਦੇਣ ਆਇਆ ਸੀ |
ਮੈਂ  ਖਿੜੇ ਮੱਥੇ ਓਹਨੂੰ ਸਵਾਗਤ ਕਿਹਾ ...
ਓਹਨੇ ਮੇਰੇ ਦਸਤਖਤ ਮੰਗੇ ਤੇ ਮੈਂ ਉਸਤੋਂ ਆਪਣਾ ਤੋਹਫ਼ਾ ਮੰਗਿਆ |
ਵੱਡੇ ਬੈਗ ਵਾਲੇ ਨੇ ਇਕ ਲਿਫ਼ਾਫ਼ਾ ਦਿੱਤਾ ਜਿਸ ਵਿਚ ਇਕ ਬੈਂਕ ਦਾ ਚੈੱਕ ਸੀ ...
ਭੇਜਣ ਵਾਲੇ ਦਾ ਪਤਾ ਮੇਰੇ ਪੁਰਾਣੇ ਦਫਤਰ ਦਾ ਸੀ |
ਮੇਰਾ ਸਾਰਾ ਹਿਸਾਬ ਨੱਕੀ ਕਰ ਮੇਰੇ ਵੱਲ ਬਣਦੀ ਰਾਸ਼ੀ ਭੇਜ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਸੀ ਜਿਸਦਾ ਮਤਲਬ ਮੈਨੂੰ ਨੌਕਰੀ ਤੋਂ ਲਗਾਤਾਰ ਗੈਰ ਹਾਜ਼ਰ ਰਹਿਣ ਕਾਰਣ ਬਰਖ਼ਾਸਤ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਸੀ |
ਮੈਨੂੰ ਇਸ ਨੌਕਰੀ ਤੋਂ ਕੱਢੇ ਜਾਂ ਦਾ ਨਾ ਕੋਈ ਗਮ ਸੀ ਨਾ ਖੁਸ਼ੀ |
ਮੇਰੇ ਅੰਦਰ ਕੁੜੱਤਣ ਸੀ ਕਿ ਉਹ ਅੱਜ ਵੀ ਨਾ ਆਈ ਜਿਸਦਾ ਇੰਤਜ਼ਾਰ ਮੇਨੂ ਸੀ 
ਨਾ ਖਤ,  ਨਾ ਆਵਾਜ਼ , ਨਾ ਉਹ ਆਪ  |
ਤੋਹਫੇ ਵਾਲਾ ਇੱਕ ਚੈੱਕ ਦੇ ਕੇ ਜਾ ਚੁੱਕਿਆ ਸੀ |
ਮੈਂ ਪੈਰਾਂ ਨੂੰ ਰਗੜਦਾ ਕਮਰੇ ਵਾਲ ਜਾ ਵਧਿਆ |
ਰਾਸਤੇ ਵਿਚ ਲੰਘਦੇ ਨੂੰ ਕੈਫੇ ਵਾਲਾ ਆਵਾਜ਼ ਮਾਰ  ਪੁੱਛਣ ਲੱਗਾ - "ਪਕਵਾਨ ਤੇਰੇ ਤਿਆਰ ਨੇ ਕੀ  ਖਾਣਾ ਪਸੰਦ ਕਰੋਗੇ" ??

ਮੇਰੇ ਮੂਹੋਂ ਨਿਕਲਿਆ ਮਹਿਮਾਨ ਅਗਲੇ ਸਾਲ ਆਵੇਗਾ |
ਵਾਪਸ ਆਇਆ ਤੇ ਕਮਰੇ ਵਿਚ ਆ ਕੇ ਅਗਲੇ ਸਾਲ ਦੀ ਉਡੀਕ ਵਿਚ ਫਿਰ ਸੋਂ ਗਿਆ |
"ਲੰਘੀ ਜਾਂਦੇ ਸਾਲ ਤਰੀਕਾ ਜਾਰੀ ਨੇ ,
ਕਦੇ ਨਾ ਮੁੜਨ ਵਾਲੀ ਦੀਆ ਉਡੀਕਾ ਜਾਰੀ ਨੇ "

Friday, 1 December 2017

ਅਜ਼ਾਬ

ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਦੇ ਪੈਂਡੇ ਲੰਬੇ ਨੇ , 

ਸਾਥ ਜੇ ਤੇਰਾ ਹੁੰਦਾ ਤਾਂ ਗੱਲ ਹੋਰ ਹੋਣੀ ਸੀ 

ਜਿੰਦਗੀ ਲੰਘਾਉਣਾ ਤੇ ਜਿਓਣਾ ਕਿਹਨੂੰ ਆਖਦੇ ਨੇ 

ਏ ਤੇਰੇ ਬਾਅਦ ਸਮਝ ਆਇਆ ...

ਤੇਰਾ ਤੇ ਮੇਰਾ ਮਿਲਣਾ ਮੇਰੀ ਜਿੰਦਗੀ ਦਾ ਉਹ ਹਾਦਸਾ ਸੀ 

ਜਿਹਦੇ ਫੱਟ ਮੈਂ ਹਮੇਸ਼ਾ ਖੁਰਚਦਾ ਰਹਿਣਾ !!!

ਅੱਜ ਤੂੰ ਫਿਰ ਚੇਤੇ ਆ ਗਈ 

ਸੋਚਿਆ ਸੀ ਹੁਣ ਤੇਰੇ ਬਾਰੇ ਕਦੀ ਨਹੀਂ ਸੋਚੂਗਾਂ , 

ਪਰ ਖਿਆਲਾਂ ਤੋੰ ਕੌਣ ਜਿੱਤਿਆ । 

ਭੀੜ ਚ ਤੁਰਿਆ ਜਾਂਦਾ ਸਾਂ ਕੋਈ ਇੱਕ ਅੱਗੇ ਤੇਰੇ ਅਰਗੇ ਪੱਟੇ ਵਾਹੀ ਜਾਂਦੀ ਸੀ ... 

ਲੱਗਿਆ ਜਿਵੇਂ ਤੂੰ ਖੜੀ ਐ , ਖੈਰ ਇੱਕ ਭੁਲੇਖਾ ਸੀ  !!! 

ਕੋਈ ਇੱਕ....

 ਉਹ ਕਿਵੇਂ ਕੋਈ ਤੇਰੇ ਅਰਗੀ ਹੋ ਸਕਦੀ ਹੈ ।
ਕਿੰਨਾ ਮਾਣ ਸੀ ਤੈਨੂੰ ਆਪਣੇ ਰੇਸ਼ਮੀ ਜਹੇ ਪੱਟਿਆ ਤੇ ..... 

ਜਦੋ ਵੀ ਤੇਰੇ ਵਾਲ਼ਾ ਨੂੰ ਮੈ ਪੱਟੇ ਆਖਣਾ ਤੂੰ - ਨੱਕ ਜਿਹਾ ਫੂਲਾ ਲੈਣਾ ।

ਤੇ ਚਿੜੱਦੀ ਜੀਂ ਨੇ ਕਹਿਣਾ - ਹਾਂ ਹਾਂ ਸਾਡੇ ਵਾਲ ਤਾਂ ਤੈਨੂੰ ਪੱਟੇ ਹੀ ਲੱਗਣੇ , ਤੇਰੀਆ ਉਹ ਯੈਂਕਣਾ ਆਂਗੂ ਆਏ ਮਹੀਨੇ 6000 ਦੇ ਕੇ ਜੁੰਡੀਆ ਜੋ ਨਹੀਂ ਕਰਾਉਂਦੀਆਂ ।
ਕਿੰਨੀ ਸੱਚੀ ਸੀ ਤੂੰ ਝੱਲੀਏ ।

ਤੇਰੀ ਉਹ ਬੁਰਜ਼ ਖ਼ਲੀਫ਼ੇ ਜਿੰਨੀ ਗੁੱਤ ਨਾਲ ਮੈਂ ਚੋੜ ਕਰਦੇ ਨੇ 

ਮੈਂ ਖੋਲ ਕੇ ਬਣਾਉਣੀ ਤੇ ਤੂੰ ਓਹਦੀ ਪੌਣੀ ਜਹੀ ਬਣਾ ਕੇ ਅੱਖਾਂ ਕੱਢਦੇ ਰਹਿਣਾ ....

 ਸਭ ਬੜਾ ਚੇਤੇ ਕਰਦਾ ।

ਜੇ ਤੂੰ ਮੁੜ ਮੇਰੇ ਸਾਹਮਣੇ ਹੋਵੇਂ ਤਾਂ ਤੇਰੇ ਓਹਨਾ ਪੱਟਿਆ ਨਾਲ ਖੇਡਦੇ ਖੇਡਦੇ ਤੇਰੇ ਤੇ ਮੇਰੇ ਸਾਰੇ ਮਸਲੇ ਸੁਲਝਾ ਲੈਣੇ ਸੀ ।
ਤੂੰ ਬੋਲਦੀ ਤਾਂ ਸਿਰਫ ਤੈਨੂੰ ਸੁਣਦਾ .... 

ਪਰ ਜਦੋ ਤੂੰ ਐੜਾ ਜਾਂ ਦੱਦਾ     

ਬੋਲਦੇ ਨੇ ਥੱਥਿਉਣਾ ਤੇ ਗੱਲ ਕਰਦੀ ਨੇ ਦੱਬ ਕੇ ਜੇ ਬੋਲਣਾ .....

ਮੇਰਾ ਹਾਸਾ ਆ ਜਾਣਾ ਤੇ ਤੈਨੂੰ ਵ੍ਵਾਰ ਵਾਰ ਓਹੀ ਬਲਾਉਦਾਂ .... 

ਤੂੰ ਖੱਪਦੀ ਨੇ ਆਖਣਾ ਸਾਡੇ ਤਾਂ ਐਵੇਂ ਹੀ ਬੋਲਦੇ ਐ ... ...
ਤੇਰੇ ਲਈ ਹਰ ਚੀਜ ਖ਼ਾਸ ਹੁੰਦੀ 

ਭਾਵੇਂ ਠੰਡ ਦੀਆਂ ਕਿਣਮਿਣ । ਸੂਰਜ ਦਾ ਡੁੱਬਣਾ ...

ਵਹਿੰਦੇ ਪਾਣੀ ਨੂੰ ਕਈ ਕਈ ਘੰਟੇ ਤੂੰ ਚੁੱਪਚਾਪ ਵੇਂਹਦੀ ਰਹਿੰਦੀ । ਤੈਨੂੰ ਇੱਦਾਂ ਚੁੱਪ ਵੇਖਦਾ ਤਾਂ ਲੱਗਦਾ ਜਿੰਦਗੀ ਨਾਲ ਭਰੀ ਮੁਟਿਆਰ ਅੰਦਰੋਂ ਕਿੰਨੀ ਖਾਲੀ ਹੈ । 

ਮੇਰੀ ਬੇਰੁਜ਼ਗਾਰੀ ਨੂੰ ਕਦੀ ਤੂੰ ਮੇਰੇ ਤੇ ਹਾਵੀ ਨਹੀਂ ਹੋਣ ਦਿੱਤਾ , ਸ਼ਾਮੀ ਜੇ ਨੂੰ ਕਹਿਣਾ ਚੱਲ ਆਜਾ ਤੈਨੂੰ ਡੇਟ ਤੇ ਲੈ ਕੇ ਜਾਵਾਂ ਤੇ 37 ਆਲੇ ਕੋਖੇ ਤੇ ਜਾ ਕੇ ਆਖਣਾ - ਸੜੂ ਜੀਂ ਲਈ ਜੀ ਚਾਹ ਧਰਿਓ ਨਿਰੀਆਂ ਜ਼ਹਿਰ ਵਰਗੀਆਂ ।

 JW Marriot ਆਲੀ ਪਾਰਟੀ ਅੱਜ ਵੀ ਮੇਰੇ ਅੱਲ ਉਧਾਰ ਐ ... ਇੱਕ ਦਿਨ ਰਾਤ ਨੂੰ ਐਵੀਂ 35 ਚੋਂ ਲੰਘਦੇ ਨੂੰ ਮੇਰੇ ਮੂੰਹੋ ਨਿਕਲ ਗਿਆ ਜਿੱਦਣ ਪਹਿਲੀ ਤਨਖਾਹ ਆਈ ਨਾ ਤੂੰ ਤੇ ਮੈਂ ਇਥੇ ਆਕੇ ਚਾਹ ਤੇ ਪਰੌਂਠੇ ਸ਼ਕਾਂਗੇ ।

ਉਸ ਪਹਿਲੀ ਤਰੀਕ ਨੂੰ ਕਈ ਸਾਲ ਉਡੀਕਿਆ ਪਰ ਓਹ ਕਦੀ ਆਈ ਹੀ ਨਹੀਂ ।

ਹੁਣ ਹਰ ਮੀਹਨੇ ਆਉਂਦੀ ਪਹਿਲੀ ਤਰੀਕ ਨੂੰ ਆਉਂਦੀ ਹੈ ਪਰ 35 ਦੀਆਂ ਲੈਟਾਂ ਕੋਲ ਜਾ ਕੇ ਕਿੰਨੀ ਦੇਰ Marriot ਨੂੰ ਵੇਂਹਦਿਆਂ ਇੱਕੋ ਗੱਲ ਮੂਹੋ ਨਿਕਲਦੀ ।

ਤੂੰ ਦੱਸ ਕਿਹੜੀ ਰੁੱਤੇ ਆਈ ਨੀ !!!
ਤੇਰੇ ਕੰਨਾਂ ਦੀਆਂ ਵਾਲੀਆਂ ਜੇ ਕਦੇ ਹੱਥ ਵਿੱਚ ਆ ਜਾਣ ਤਾਂ ਕਿੰਨੀ ਕਿੰਨੀ ਦੇਰ ਬੰਦ ਕਮਰੇ ਵਿੱਚ ਬੈਠਾ ਵੇਹਦਾਂ ਰਹਿਣਾ , ਜਦੋ ਤੱਕ ਕੋਈ ਹੋਰ ਮੈਨੂੰ ਤੇ ਤੇਰੀਆਂ ਵਾਲੀਆਂ ਦੇ ਨਾਲ ਹੁੰਦੀ ਗੱਲਬਾਤ ਨੂੰ ਆ ਕੇ ਨਹੀਂ ਟੋਕਦਾ । 

ਉਹ ਅਸਮਾਨੀ ਰੰਗ ਦਾ ਝੱਗਾ ਜੋ ਮੇਰੇ ਜਨਮਦਿਨ ਤੇਂ ਦਿੱਤਾ ਸੀ ਉਹ ਓਦਾ ਹੀ ਮੇਰੀ ਅਲਮਾਰੀ ਚ ਲੱਗਿਆ ਪਿਆ , ਡਰ ਲਗਦਾ ਕੀਤੇ ਕੋਈ ਹੱਥ ਲਾਇਆ ਮੈਲਾ ਵੀ ਨਾ ਕਰਦੇ ।

ਤੇ ਤੇਰੇ ਪੀਲੇ ਰੰਗ ਦੇ ਸੂਟ ਆਲੀ ਫੋਟੋ ਮੈਂ ਅੱਜ ਤੱਕ ਦਿਲ ਵਿਚ ਰੱਖੀ ਬੈਠਾ , ਵਕ਼ਤ ਕਿੰਨਾ ਵੀ ਕਿਉਂ ਨਾ ਬਦਲ ਲਏ ਤੇਰੀ ਉਹ ਤਸਵੀਰ ਮੇਰੀਆਂ ਅੱਖਾਂ ਵਿਚ ਓਹੀ ਰਹੂਗੀ ।
ਜਦੋ ਵੀ ਕੀਤੇ ਖਾਸ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮ ਤੇ ਨਿਕਲਦਾ ਸੂਰਮਾ ਹੁਕਮ ਅਨੁਸਾਰ ਪਾ ਲੈਣਾ । ਕੋਈ ਵੀ ਆਖੇ ਮੈਨੂੰ ਮੈ ਓਦੋਂ ਹੀ ਚੰਗਾ ਲਗਦਾ । 
ਮਿਰਚਾਂ ਮੈਂ ਜਵਾ ਨਹੀਂ ਖਾਂਦਾ ,

ਪਰ ਜਦੋ ਵੀ ਕਦੀ ਸ਼ਿਮਲੇ ਜਾਂ ਕਸੌਲੀ ਨੂੰ ਜਾਣਾ ਉਸ ਇੱਕ ਥਾਂ ਤੋਂ ਮਿਰਚਾਂ ਭਰ ਕੇ ਕੁਲਚਾ ਵੀ ਖਾ ਲੈਣਾ ਕਿਉਂਕਿ ਉਹ ਤੂੰ ਮਿਹਣੇ ਮਾਰਦੀ ਸੀ ਨਾ ਕਿ ਜੇ ਮੈਂ ਤੇਰੇ ਨਾਲ ਮਿੱਠੇ ਆਲੀ ਜ਼ਹਿਰੀਲੀ ਚਾਹ ਪੀਂਦੀ ਤੇ ਤੂੰ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਮਿਰਚਾਂ ਭਰ ਕੇ ਕੁਲਚਾ ਵੀ ਖਾ ।

ਅੱਖਾਂ ਚੋਂ ਲਹੂ ਵੀ ਕਿਉਂ ਨਾ ਵੱਗ ਆਵੇ , ਪਾਣੀ ਦਾ ਇੱਕ ਤੁਪਕਾ ਨਹੀਂ ਪੀਂਦਾ , ਖੈਰ ਹੁਣ ਇਹ ਵੀ ਚੰਗਾ ਲੱਗਦਾ ।

ਨਸ਼ੇ ਤੇਰੇ ਪਿਆਰ ਚ ਹੀ ਇੰਨਾ ਸੀ ।ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਨਸ਼ੇ ਨੂੰ ਅੱਜ ਤਾਈਂ ਮੂੰਹ ਨੂੰ ਲੱਗਣ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤਾ ।

ਤੇਰੀ ਉਹ ਥਾਂ ਅੱਜ ਵੀ ਉਹੀ ਹੈ ,

ਕੰਮ ਤੋਂ ਵਾਪਸ ਆਏ ਕੇ ਜਿੰਨਾ ਮਰਜੀ ਚਾਹਾਂ 

ਘੱਟ ਪਕਾਵਾਂ ਜਾਂ ਬਣਾਵਾਂ ....

ਵਾਧੂ ਬਣ ਜਾਂਦੀ ਹੈ

ਰੱਖੀ ਮਿੱਸੀ ਬਣ ਜਾਂਦੀ ਹੈ 

ਤੇਰੇ ਤੇ ਮੇਰੇ ਹਿੱਸੇ ਦੀ ਖਾ ਵੀ  ਲੈਣਾ ....

ਕਿਉਂਕਿ ਮੈਂ ਅਧੂਰਾ ਹੁਣ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਛੱਡਣਾ ,

ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਤੇ ਇੰਤਜ਼ਾਰ ਪੂਰਾ ਕਰੂੰਗਾ ।

ਮੈਂ ਉਸ ਦਿਨ ਦੇ ਚੜਨ ਦੀ ਉਮੀਦ ਵਿਚ ਬੈਠਾ ਜਿਸ ਦਿਨ ਤੜਕੇ ਉੱਠ ਸੂਰਜ ਵੱਲ ਵੇਖਦਾ ਹੋਵਾਂ  ਤੇ ਮੇਰੇ ਜਿਹਨ ਚ ਤੇਰਾ ਜ਼ਿਕਰ ਨਾ ਹੋਵੇ |  

ਹਾਲਾਤ ਤੇ ਇੰਨਾ ਵੱਸ ਨਹੀਓ ਕਿ ਜੁਰਅਤ ਭਰ ਇੰਨਾ ਨੂੰ ਠੱਲ ਸਕਾ . ਤਰਕਾਲਾਂ ਨੂੰ ਜਦੋ ਦਿਨ ਠੱਰਨ ਲਗਦੈ , ਕੋਈ ਅੱਗ ਜਿਹੀ ਬਲਦੀ ਹੈ .... 

ਜਿਹਨੂੰ ਸੇਕਦੇ ਸੇਕਦੇ  ਇਕ ਤੱਪਦਾ ਸੂਰਜ ਅੱਖਾਂ ਕੱਢਣ ਲਗਦੈ |
ਸੱਚ ਡੁੱਬ ਚੁੱਕਿਆ ...

ਇਕ ਝੂਠ ਹੈ ਜੋ ਪਾਣੀ ਦੇ ਉੱਤੇ ਤੈਰ ਰਿਹਾ ...

ਇਕ ਦਿਨ ਇਹ ਵੀ ਡੁੱਬ ਜਾਏਗਾ 

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Friday, 20 October 2017

Mr. बड़बड़ कुमार

सोचने का भी एक तरीका होता है , सोचना भी बहुत सी छोटी छोटी चीज़ों की तरह कोई नहीं सिखा सकता है ।
जैसे पिछले के बारे में सोच के हम उदास हो लेते है और आगे के बारे में भी ।
जो खुश रह पाते है वो कुछ होते है चलते वक़्त के साथ साथ जीते है ।
अंग्रेजी में जिसे लिव इन प्रेज़न्ट बोलते है ।
ऐसे ही एक व्यक्ति थे " बड़बड़ जी "
उम्र यही कोई 25 बरस ।
रंग-  साँवला
कद यही कोई  साढ़े पांच फीट
एक दम फुर्तीला इंसान , उसके अंदर ऐसी शक्ति कि मिट्टी को भी सोना कह के बेच दे ।
एक दम परफेक्ट सेल्समैन ।

दिवाली के साथ आते है भूले बिसरे दोस्तों के इनबॉक्स & व्हात्सप्प मैसज ।
सुबह माँ इससे पहले उठाये ।
फ़ोन की स्क्रीन पे फ़्लैश होते है ढ़ेरो फ़ोन कॉल्स और मैसेज । अपनी कमी कहूँ या बुरी आदत 
मुझे फ़ोन के general mode से गुरेज़ है ।
अक्सर फ़ोन को साइलेंट मोड पे ही रखा है ।
आलस कह ले या मजबूरी ।
मुझे इसकी टिंग टोंग की दख़ल बर्दाश्त नहीं होती ।
फ़ोन से शुरू से ही ख़ास दोस्ती नहीं है ।
ऐसा समझ लीझिये इसके साथ हमारी अरेंज मैरिज है ।
न ही मैं इसे कभी समझ पाया और न ही ज़रूरत को ।

कुछ साल पहले घर से एक जगह दूर कही नौकरी मिली थी । कंपनी के नियमो के अनुसार सैलरी अकाउंट किसी निजी बैंक में अनुवार्य था । सरकारी बैंक में खाता खुलवाना भी आफ़त है और प्राइवेट बैंक से पहले कभी सामना नहीं हुआ था  ।
मुझ जैसे इंसान को बैंक के नाम से खिन्न आती है । निजी बैंक में खाते की अहतियाज़ थी सो पहुँच गये बैंक में ।

ससुराल जाने पे जितनी ख़ातिरदारी जमाई राजा की होती है उसके लगभग ही प्राइवेट बैंक में ।
आदिल कुमार नामक एक सेल्समैन से मुलाकात हो गई ।
बातचीत का अंदाज़ उनका ऐसा था कि जैसे जो उन्होंने कह दिया सात वचन । जान पहचान में ही उन्होंने ने मेरे शहर से अपने 3-4 रिश्तेदार बता दिए । जिस दफ्तर में हमें नौकरी मिली थी वहाँ का हर व्यक्ति उनका दोस्त ।जिस व्यक्ति का नाम लेते उनका नंम्बर फोन डायरेक्टरी में से निकाल के दिखाते । एक दम बड़बड़ एक्सप्रेस ।

खाता खोलने के नाम पर सिर्फ हमारा आधार कार्ड लिया गया और कहा गया बाकी की सेवाएं आप घर बैठे प्राप्त कर पाएंगे आपको सिर्फ एक फोन मिलाना है - " आदिल कुमार की ये नवाज़िश थी या जॉब ???
मैने पुछा नहीं ।
मुझे ज्यादा मित्रता बनाना पसंद नहीं ।
मुझे अकेलापन नहीं एकांत अच्छा लगता है । किसी से बिन बात बतियाना अजीब भी लगता है ।
मैंने हैरानी परेशानी में अपना नँबर बड़बड़ कुमार को दे दिया ।

जिस तरह पहले भी जिक्र किया है ।
फोन से ख़ास दोस्ती नहीं है तो आप अंदाजा लगा सकते है कि मैं एक मिलनसार शख़्सियत नहीं हूँ , मगर मैं नाशुक्रा भी नहीं हूँ ।
बिलकुल इसके उल्ट थे "आदिल कुमार जी | "

"बड़बड़"  के नाम से उनका कांटेक्ट नाम फ़ोन में सेव कर लिया । तअज्जुब की बात ये थी कि आदिल कुमार का कोई निश्चित वक़्त नहीं था फ़ोन करने का ।
हर वक़्त बैंक की हर समस्या के सुझाव के लिए तैयार रहते । दिन में 2 बार माँ से बात करता हूँ उसके इलावा सिर्फ बड़बड़ कुमार जी थे जिन्हें मेरी चिंता होती ।
"पंडित जी मैं खाने पे बैठा था तो सोचा आप से भी पूछ लू आप शहर में नए है तो पूछ लू खाना वाना सही मिल रहा है न ??
कभी कभी दिल करता था बैंक में अकाउंट बंद करवा दूँ , डेबिट कार्ड की कोई समस्या हो या फिर किसी और employee की बैंक स्टेटमेंट ।

मेरे नाम से मेरे ही दफ्तर के लोगों को मेरे साथ पक्की दोस्ती बता कर बाकी employees का खाता भी अपने बैंक में खोलते  । उसके इलावा कोई क्रेडिट कार्ड ,कोई लोन मेरे नाम से चिपकाते । परफेक्ट सेल्जमैन।

आदिल कुमार जी थे एक अच्छे सेल्समैन ।
मेरा तबादला कुछ ही ..दिनों में हो गया ।
नाम बड़बड़ नाम से वैसे के वैसे ही सेव था ।
मेरी आदत भी वैसे के वैसे ही थी फ़ोन न उठाने की ।
4 साल तक हर दिवाली , होली पे मैसेज आता ।
कभी कभी फ़ोन भी आता और बड़बड़ कुमार बताते के

उनकी भी प्रोमशन हो गयी है 50 खाते और 20 क्रेडिट पे बैंक ने उन्हें नया मोटरसाइकिल दिया है ।
मुझे बड़बड़ में एक न ही दोस्त दिखता
और न ही कोई हमदर्द । वो सिर्फ एक मशीन था ।
जिसे सिर्फ काम करना है उसकी भी भला कोई ज़िन्दगी ।
हर किसी को कस्टमर की नज़र से देखने वाले शख़्स।

मुझे बड़बड़ जैसे लोग बड़े अजीब लगते है ।
हमेशा हैरान होता हूँ - कैसे सिर्फ दिमाग से ही जी लेते है ।
सालो तक बड़बड़ का मैसेज हर दिन त्यौहार पे आता न ही मैं कोई दिलचस्पी दिखाता ... मगर वो साल दर साल शुभकामनाये भेजता और मै दिनों बाद देखता और डिलीट करता ।
रिप्लाई में थोड़ी बहुत दिलचस्पी दिखा लेता ।

अब एक साल से बड़बड़ का कोई संदेश नहीं कोई खबरसार नहीं सोचा शायद वो भी सोचता होगा कि क्या फायदा जब कोई आगे से जवाब न दे ।
इस साल मुझे अपना खाता बंद करवाना था ।
कही से नंम्बर ढूंढा  , डायल किया मगर कोई जवाब नहीं मिला ।
ऐसे ही होते है सेल्समैन जहाँ इनकी कोई सेल नहीं वहाँ काहे की सर्विस । सौ गालिया बकी की साला जब काम नहीं था तो दस दस फ़ोन मगर आज जरूरत है तो कोई जवाब ही नहीं ।

वक़्त निकाला और पी. एफ़ क्लियर करने के बाद उसी ब्रांच पंहुचा और खाता बंद करवाने की अर्जी डाली ।

ब्रांच मैनेजर से सीधा शिकायत रख दी
देखिये मैनेजर साहब काम के वक़्त फ़ोन क्यों नहीं उठाते आप लोग ?
मैनेजर साहब ने बताया बाकी के सेल्समैन न ही किसी को फ़ोन करते है और न ही खुद किसी को करने देते है । ये आदिल कुमार के शुरू किये हुए ट्रेंड थे । सारा बैंक अपने कंधो पे उठा रखा था ।
लेकिन जरूरत के वक़्त फ़ोन तो उठाना चाहिए न मैनेजर साहब ।
मैंने पूछा तो अब कहाँ है वो ?

मैनेजर बोला - न्यू ईयर की रात  को सड़क हादसे में मर गया । शराब पीने की लत्त थी ।

पसीना पोंछते पोंछते मैं बैंक से बाहर निकला और घर आ कर फ़ोन को general mode पे कर दिया ।
हर एक शुभकामना ज़िन्दगी के मायने बदलती है ।
ये दुनिया प्यार से चलती है ।

मैसेज और फ़ोन कॉल कोई भी हो अब रिप्लाई जरूर करता हूँ ।

पंकज शर्मा

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तारीफ़

"ਤਨ ਦੇ ਪਰਦੇ ਪਿੱਛੇ ਮਨ ਕਿਸੇ ਨਾਲ ਕੀ ਕਰਦਾ ਹੈਂ, ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਜਾਣਦਾ" तेरी जीत लिखूं या अपनी हार लिखूं उसकी नफ़रत लिखूं या अपना प्यार लिखूं.....