Monday, 5 February 2018

दीवारें

मैं क्या लिख  रहा हूँ क्यों लिख रहा हूँ ।
जायज़ है भी है या फज़ूल ।
इसके बारे में न पहले सोचा और न ही अब सोचता हूँ ।
क्योंकि मैं सिर्फ हर बार तुम्हे सोचता हूँ ।
तुम कहोगी फज़ूल है ।
मगर मेरा इसमें कोई बस्स नही , तुम्हारे बारे में सोचते सोचते ज़िन्दगी निकल सी गई । कई बार दिल करता है जो बातें तुम्हारे बारे में सोचता हूँ वो तुम्हे कह सकता ।
पर प्यार साबित करना होता है ।
मुझे तुम्हारी आँखों से दूर जाना था इसका मतलब मैं पहले जान गया था । आंखों से दूर मतलब दिल से दूर ।
क्योंकि प्यार सिर्फ मैंने किया था ।
जिसका मुझे भी एहसास नही कितना ।।
क्या मैं तुम्हे पा सकूँगा ।
शायद नही ......
क्या ज़िन्दगी ऐसे ही निकल जाएगी ।
मगर मैं फिर से कोशिश करता हूँ ।
एक कोशिश आज तक सिर्फ तुम्हें पाने की करता रहा ।
अब एक कोशिश ये करूँगा ।
तुम्हे भुला सकूं ।
वैसी हर शै को खत्म कर दूंगा , जिसमे तुम शामिल हो । 
क्या काफी होगा तुम्हे भुलाने के लिए ।
तुम्हे पाने की जो कोशिशें थी वो नाकाम रही । अब तुम्हे पूरी ज़िंदगी लगेगी भुलाने में ।
इसे बेबसी का नाम दूँ 
या बेचैनी कह के सहता रहूँगा ।
मैं बेपरवाह होना चाहता था मगर फिर भी परवाह है ।
लौटने को जी चाहता है ।
तुम्हें देखता हूँ तो पीछे सिर्फ एक दीवार है ।
इस दीवार को तोड़ने को जी चाहता है ।
मगर ये दीवार तुम्हारे घर की है ।
करे क्या कि दिल भी तो मजबूर है ,
जमीन सख्त है और आसमां दूर है ।

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ਬੱਲੀ

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