Tuesday, 1 March 2016

पर्दा

इंसान क्या ..किरदार एक नाटक का ... 
नाटक क्या ..पर्दा ज़माने का ..


हर सुबह इस रंगमंच का पर्दा उठता है |.. 

रंगमंच क्या ..ज़िन्दगी नाम दिल बहलाने का ..
.रिश्ते और नाते ..सभी किरदार है निभाते ...
किरदार क्या ..जरिया इंसान की पहचान बनाने का
इश्क़ -इ -दर्द ..धोखा ..वफ़ा ..बे -वफ़ा ..
ये सब क्या..वक़्त है नाटक पे पर्दा गिराने का


वैसे तो कई रंगो के आते है बज़ार में मुखोटे ..

मगर मैं वही उठा लाता हूँ .


जिसे पहन कर मैं अच्छा दिख स्कू ..

छुपा लू जो भी छुप सकता है ...


हसना  क्युकी बिकना  हैं 



सारा दिन नौटंकी करता हूँ भीड़ में चुपचाप चलने की ..

मेरा एक दौड़ हैं सातवें  आस्मां  से भी आगे निकलने की ...


वही आठवा आसमान जो सस्ता , टिकाऊ और भीड़ से परे हैं ..

जहाँ सूरज , चाँद , तारे एक साथ  निकलते  हैं 


यहाँ न कोई थकता हैं ...

न कोई भागता है ...
 सामान रखने की जगह को घर नहीं ..
 और सामान लाने के लिए बाहर नहीं भागना पड़ता ..


सूअर भी है बड़े काम के ..

कूड़ेदान में मूह डाल के संगीत बनाते हैं 


मुस्कराने की भाषा नहीं हैं ..

निर्माता निर्देशक  परिपूर्ण हैं .
उसकी बनाई हर चीज़ चलती हैं ...


एक रोटी के अनेक निवाले ..

हर निवाले पे बहस नहीं छिड़ती..


ज़िन्दगी की ब्रेक पैरो के हाथो में होती हैं ..

हर इंसान बोलता हैं ...


इस को साहित्यनगरी कहते हैं ..

जहाँ सच को छुपाने के कई औज़ार हैं 


इंसान क्या ..किरदार एक नाटक का ... 

नाटक क्या ..पर्दा ज़माने का ..




DATE  26 - 03 - 2015 

TIME  01:38 AM  


PANKAJ SHARMA 


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