आज एक मां भूखी स्टेशन पर दिखी ,
गर्मी में पानी को तरस रही माँ की हालत बियान नहीं करूंगा |
HAPPY MOTHERS DAY कहता हूँ जिन लोगो को कहते सुना था
वो घर घर नहीं ,जिस घर में माँ नहीं होती
देश में कितने ही ऐसे घर हैं , जहा से रोज़ कोई न कोई बेटा अपनी माँ को शहर से दूर बृद्ध आश्रम में छोड़ के आता हैं |
या फिर दूध में जहर घोल के 75 साल की माँ को ख़त्म किया जाता हैं
मेरी बातैं हवा में उड़ता तीर नहीं हैं .. GOOGLE सब के पास हैं
बचपन में स्कूल की किताब में ये नग्में पढ़ी थी |
" आटा कम पड़ गया था, माँ ने बटवारा कुछ इस तरह किया... मेरे हिस्से की भूख, उसके हाथ लगी...
उसके हिस्से की रोटियाँ, मेरे हाथ"
जीवन को नाम देती,
होठों को मुस्कान देती,
सपनो को पंख देती,
हौसलों को ऊँचा कर देती,
दर्द में मेरे जो कराह देती,
माथे का मेरे पसीना पोंछ देती,
प्यार से जो सर पर हाथ फेर देती,
अपनी ममता भरी छाँव में लेकर,
जो दुनिया के हर दुःख से दूर कर देती
बाजार में हर रिश्ता टंगा पाया,
पर माँ का नाम कहीं भी नजर नहीं आया
वैसे तो ये रिश्ता किसी दिन का मोहताज नही, 'माँ ' शब्द जितना छोटा है उतना ही बड़ा प्रभाव छोड़ता है हम सब की जिंदगी में, माँ गरीब की हो या अमीर की, माँ वेश्या हो या मजदूर या फिर कोई बड़ी अधिकारी या फिर बिजनिस टाइकून परंतु बच्चे के लिए तो वो सिर्फ उसकी माँ होती है; एक ऐसी गोदी जिसने उसे उस समय भी रोते से चुप कराया जब उसने ठीक से खड़े होकर चलना भी नही सीखा था, एक ऐसी गोदी जिसने उसे उस समय भी रोते से चुप कराया जब पहली बार चलकर उसे ठोकर लगी|
पर आज एक मां को चुप कराने वाला कोई ना था |
मैं ही नहीं,
बड़े बड़े सूरमा भी याद करते हैं...'दर्द' जब हद से ज्यादा होता है तो,
सब "माँ" को याद करते हैं|
पर 4 बेटो की माँ को जब दर्द हुआ तो छींक किसी बेटे को ना आई |
मनुष्य का शरीर सिर्फ 45 del (यूनिट) तकका ही दर्द सहन कर सकता है ।
पर बच्चे को जन्म देते समय एक माँ को 57
(यूनिट) तक का दर्द होता है । यह 20 हड्डियों के एक साथ टूटने के बराबर है ।
पर आज माँ के सिर दर्द को झूठा बहाना बताया गया , ये सुनने का दर्द उस दर्द से ज्यादा था |
क़लम कुछ और लिखना चाहता थी ,मगर काग़ज़ ही भीगा जा रहा है
ये जवाब था उस दोस्त के लिए जिस दोस्त का फ़ोन आया था , और बोला था -सब के बारे में लिखते हो पंकज भाई .. पर
मां के बारे में कुछ न लिख सके , मां से प्यार नहीं है क्या ??
मैं लिखता हूँ अपनी रूह को खुश करने के लिए |
पहले कागजो पे लिखता था , लिखता हूँ जब दिल टूटता हैं . जो बात बोल नहीं सकता लिख देता हूँ |
शायद आप जैसा कोई पढ़ ले..पर झूठी हो या सच्ची वाह ! वाह ! के लिए कभी भी नहीं लिखा
शायद मेरी मां को मुझसे कितना प्यार है , एक शायरी में या FACEBOOK के status में बयिान ना कर सकू ..अगर मैं अपनी माँ से वाकई प्यार करता हूँ तो FB पर ढोल मंजीरा बजा के बताने की जरूरत नहीं है।
और तुम्हारी माँ को .... चरण छुके प्रणाम करता हूँ दोस्त |
गर्मी में पानी को तरस रही माँ की हालत बियान नहीं करूंगा |
HAPPY MOTHERS DAY कहता हूँ जिन लोगो को कहते सुना था
वो घर घर नहीं ,जिस घर में माँ नहीं होती
देश में कितने ही ऐसे घर हैं , जहा से रोज़ कोई न कोई बेटा अपनी माँ को शहर से दूर बृद्ध आश्रम में छोड़ के आता हैं |
या फिर दूध में जहर घोल के 75 साल की माँ को ख़त्म किया जाता हैं
मेरी बातैं हवा में उड़ता तीर नहीं हैं .. GOOGLE सब के पास हैं
बचपन में स्कूल की किताब में ये नग्में पढ़ी थी |
" आटा कम पड़ गया था, माँ ने बटवारा कुछ इस तरह किया... मेरे हिस्से की भूख, उसके हाथ लगी...
उसके हिस्से की रोटियाँ, मेरे हाथ"
जीवन को नाम देती,
होठों को मुस्कान देती,
सपनो को पंख देती,
हौसलों को ऊँचा कर देती,
दर्द में मेरे जो कराह देती,
माथे का मेरे पसीना पोंछ देती,
प्यार से जो सर पर हाथ फेर देती,
अपनी ममता भरी छाँव में लेकर,
जो दुनिया के हर दुःख से दूर कर देती
बाजार में हर रिश्ता टंगा पाया,
पर माँ का नाम कहीं भी नजर नहीं आया
वैसे तो ये रिश्ता किसी दिन का मोहताज नही, 'माँ ' शब्द जितना छोटा है उतना ही बड़ा प्रभाव छोड़ता है हम सब की जिंदगी में, माँ गरीब की हो या अमीर की, माँ वेश्या हो या मजदूर या फिर कोई बड़ी अधिकारी या फिर बिजनिस टाइकून परंतु बच्चे के लिए तो वो सिर्फ उसकी माँ होती है; एक ऐसी गोदी जिसने उसे उस समय भी रोते से चुप कराया जब उसने ठीक से खड़े होकर चलना भी नही सीखा था, एक ऐसी गोदी जिसने उसे उस समय भी रोते से चुप कराया जब पहली बार चलकर उसे ठोकर लगी|
पर आज एक मां को चुप कराने वाला कोई ना था |
मैं ही नहीं,
बड़े बड़े सूरमा भी याद करते हैं...'दर्द' जब हद से ज्यादा होता है तो,
सब "माँ" को याद करते हैं|
पर 4 बेटो की माँ को जब दर्द हुआ तो छींक किसी बेटे को ना आई |
मनुष्य का शरीर सिर्फ 45 del (यूनिट) तकका ही दर्द सहन कर सकता है ।
पर बच्चे को जन्म देते समय एक माँ को 57
(यूनिट) तक का दर्द होता है । यह 20 हड्डियों के एक साथ टूटने के बराबर है ।
पर आज माँ के सिर दर्द को झूठा बहाना बताया गया , ये सुनने का दर्द उस दर्द से ज्यादा था |
क़लम कुछ और लिखना चाहता थी ,मगर काग़ज़ ही भीगा जा रहा है
ये जवाब था उस दोस्त के लिए जिस दोस्त का फ़ोन आया था , और बोला था -सब के बारे में लिखते हो पंकज भाई .. पर
मां के बारे में कुछ न लिख सके , मां से प्यार नहीं है क्या ??
मैं लिखता हूँ अपनी रूह को खुश करने के लिए |
पहले कागजो पे लिखता था , लिखता हूँ जब दिल टूटता हैं . जो बात बोल नहीं सकता लिख देता हूँ |
शायद आप जैसा कोई पढ़ ले..पर झूठी हो या सच्ची वाह ! वाह ! के लिए कभी भी नहीं लिखा
शायद मेरी मां को मुझसे कितना प्यार है , एक शायरी में या FACEBOOK के status में बयिान ना कर सकू ..अगर मैं अपनी माँ से वाकई प्यार करता हूँ तो FB पर ढोल मंजीरा बजा के बताने की जरूरत नहीं है।
और तुम्हारी माँ को .... चरण छुके प्रणाम करता हूँ दोस्त |

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