अपने आप को मुसाफिर कहना अच्छा लगता हैं |
सड़को से ख़ास दोस्ती हैं |
ज़िन्दगी का बेहतर मज़ा मेरी मानो तो फ्रंट सीट से ज्यादा आईने से बाहर देखने में हैं |
पहले जब भी देर रात कभी वापस लौटता था तो पैदल चलते चलते यूनिवर्सिटी तक पहुँचता |
अगर आप मेरी परिवर्ती के इंसान हैं तो रात को पैदल चल के देखे ...
जब कहीं पहुँचने की जल्दी न हो .... विश्वास मानिए . ज़िन्दगी और सड़कें और खूबसूरत लगेगी |
एक बंद कमरे के इलावा बाहरी लोगो से दोस्ती की बात करूँ तो एक बहुत अच्छी दोस्त हैं |
" एक सड़क "
वर्चुअल दुनिया से जब दूर जा के कहीं रुकता हूँ तो वो हैं ये एक सड़क |
जिसका एक अपना दर्द है
सड़क की अपनी कुछ ख्वाहिशें हैं |
इस सड़क की अपनी एक दास्ताँ हैं |
ये शहर दुनिया के व्यस्त शहरों में से एक शहर हैं ..
उसकी एक अपनी जुबान हैं -
दोस्ती अच्छी हो गयी थी इस लिए उसके दर्द से अच्छी शिनाख्त सी हो गयी |
जब कभी भी वहां से आता था.....
तो रास्ते में एक बगीचा आता और एक तरफ सूखा पुल
एक कला का मंदिर और एक पेड़ के नीचे छोटा सा मंदिर
सब कुछ सड़क के दो किनारो से जुड़ा वो रात का अक्स जिह्न में वैसे का वैसे छुपा बैठा हैं |
सर्दी की रात 11 बजे की दूधिया रौशनी में धुली चमकती सड़कें
धीरे धीरे फिर अपनी चुप्पी के रहस्य में डूबती हुईं .....
लोग घरों में बंद चुपचाप लेते चुस्कियाँ ...
और एक मैं और फिर कुछ बोलती सड़क ......
वो बोलती मैं व्यस्त सड़को में से एक हूँ |
आराम का समय मेरे पास बहुत कम होता हैं
साल हो गए हैं मुझे ठीक से सीए हुए |
मेरी नींद तक में बसीं होती हैं लपटे .. और चीखे |
मैं तो बेनाम हूँ ... मेरे माथे पे लोगो के नाम लिख दिए जाते हैं |
फिसलने के बाद सब हँसते हैं पर मैं नहीं ...
मेरे कन्धों पे कई मजहब और पते लिख रखे हैं ..
दो दोस्त करीब से जब गुजरते हैं सुनती हों उनकी करीब से बातें ...
शायद ऐसा कोई दिन नहीं होता जब किसी का मुझमे कुचल जाने का इलज़ाम नहीं होता |
दो लडकिया गुज़रती हैं रोज़ मेरे पास से |
ऐसा कोई दिन हो जब कोई हड़बड़ी न हो
सोचती हूँ आज कोई पीछा न कर रहा होगा |
उनकी पोशाकें किसी मज़हब नामी या चरितर ढांचें का प्रमाण नहीं होंगी |
मेरे आस पास नेतवादी भूख हैं
उनका दिमाग मेरे चौराहो पर टिका होता हैं ..
जहाँ हत्या को दुर्घटना कह कर मुझे बदनाम किया जाता हैं
मेरे शहर के शबदकोष अपना अर्थ खो बैठे हैं |
सबकी मुश्किलें मैं सुनती हूँ ... सबका फिकराना हैं मुझे
कोई रिक्शा चलाता है
जब कोई भूख से मरता हैं ..
सम्मान बेच कर -.....जब कोई अपना हाथ फैलाता है
शहनाई कि गूंजः में कर्ज के लिए बिलबिलाता बाप है
तुम सब का क्या हैं -
सुनना तो मुझे पड़ता हैं |
तुम्हारा दर्द तो छोटा हैं शायद आज नहीं तो कोई और भर देगा .....
तुम्हे तो बस कविताएं और कहानिया दिखती हैं ज़िन्दगी |
मेरा क्या -अपनी ठंडी छाती में तो उनको मैं सुलाती हूँ |
जब कोई कोख से उतार कर कोई नन्ही मुझपे फेंक चलता हैं
उसकी रोती किलकारियाँ सुनती हूँ पूरी रात |
मुझे हर रोज़ उस सुबह की तलाश रहती हैं
जब ये सनाटा टूटे ....
भीड़ से खचाखच भोझ मुझ पे आन पड़े ...
और फिर कोई चीर फाड़ करे ...|
मैं एक लम्बी छुट्टी पर जाना चाहती हूँ |
मेरी कुछ ख्वाहशें हैं - ख्वाहशें ऐसी हैं कि
जहाँ जा कर मेरे दोनों किनारे आपस में मिल सके .
जहाँ एक बड़ी सी झील हो .. और मैं वहां जा के थम सकूँ |
और शाम को जहाँ सूरज जब नहाने उतरे |
बस इतनी सी ख़्वाहिश हैं|
ये बात चीत और भी होती हैं |
उसकी सड़क की बातें आज भी थकान पैदा करती हैं |
जब भी सुनसान रास्तो से गुज़रता हूँ तो वो आवाज़ें आज भी याद आती हैं
सुनसान रातो में
सन्नाटो में आज भी ख़ामोशी नहीं मिलती |
हर बार कहता हूँ - मैं न तो लेखक हूँ
जो कह नहीं सकता हूँ बस वो लिख देता हूँ |
लफ्ज़ो को पन्नो पर कुरेदना अच्छा लगता हैं ..
अच्छा लिखूंगा तो खोजने पर जल्दी मिल जाऊगा |
यहाँ नहीं तो ऊपर दिए हुए पते पर कहीं किसी रात को सड़क की ख़्वाहिशें सुनते हुए |
पंकज शर्मा
04
December 2015

No comments:
Post a Comment